SARJANA CHATURVEDI

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Thursday, 30 January 2014

जानती हूं बिटिया तेरा कोई कसूर नहीं

छोटी सी थी गुडिय़ा तो आस पड़ोस में रहने वाले अंकल, भैया या फिर चाचा संबोधन जो भी हो सबकी लाडली थी। सबकी प्यारी नन्ही परी को कभी कोई चॉकलेट दिला देता तो कभी कोई उसे उसकी पसंदीदा गटागट की गोलियां दिला देता और उस नन्हीं सी गुडिय़ा के चेहरे पर ऐसी मुस्कान बिखर जाती कि मानो उसे सारी दुनिया की खुशियां एक पल में ही मिल गई हों। सब भी उसकी तोतली भाषा में ढेर सारी बातों को सुनकर बहुत खुश होते लेकिन अब नहीं। अब वह गुडिय़ा पहले जैसी नहीं रही क्यों क्योंकि अब पांच साल की उस बिटिया को अब मम्मी या दादी एक पल के लिए भी आंखों से ओझल नहीं होने देती हैं। उसे खेलना भी है तो अपने ही घर में मगर जब कभी वह जिद करती है और अपनी तोतली जुबान में बोलती है हमें भी थेलने जाना है तो मां उस नन्ही बच्ची पर कभी खीज जाती है तो कभी गुस्से में एक तमाचा जड़ देती है। और वह आंखों में आंसू लिए अपनी खेलने की गुडिय़ा के साथ सो जाती है। मां आती है चुपचाप उसे सोते हुए देखती है और खुद आंखों में आंसू भरकर खुद से कहती है
जानती हूं बिटिया तेरा कोई कसूर नहीं है मगर क्या करूं यह दुनिया अब पहले जैसी नहींं है। सब कुछ बदल गया है अब पांच साल की बच्ची में उसे मासूमियत नहीं दिखती ना किसी वृद्धा में मां का वात्सल्य न किसी लड़की में बहन की तस्वीर अब तो नजर आती है तो सिर्फ अपनी हवस बुझाने का जरिया। आज मां कुछ परेशान है, क्योंकि आज सुबह ही उसने अखबार में पांच साल की बिटिया से रिश्तेदार द्वारा बलात्कार की खबर जो पढ़ी है। अब कैसे सोएगी यह मां पता नहीं....
सब कहते हैं आंसू कमजोर लोगों की निशानी है लेकिन जब कोई साथ ना हो तो किसी का भी साथ हो वह मजबूत ही लगता है।
उस समय आंसू कमजोर कैसे हो सकते हैं।

Friday, 24 January 2014

दक्षिण की झांसी की रानी - वीरांगना रानी चेन्नम्मा



खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी... देश की आजादी के लिए लडऩे वाली वीरांगनाओं में झांसी की रानी के बारे में तो हम सब जानते ही हैं लेकिन अपनी मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाली वीरांगनाओं की सूची में ऐसी कई बालाएं हैं जिनके बारे में देशवासी बहुत कम जानते हैं। ऐसा ही एक नाम है रानी चिन्नम्मा का। 
उत्तर भारत में जो स्थान स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का है, कर्नाटक में वही स्थान कित्तूर की रानी चेन्नम्मा का है। चेन्नम्मा ने लक्ष्मीबाई से पहले ही अंग्रेजों की सत्ता को सशस्त्र चुनौती दी थी और अंग्रेजों की सेना को उनके सामने दो बार मुंह की खानी पड़ी थी। रानी चेनम्मा के साहस एवं उनकी वीरता के कारण देश के विभिन्न हिस्सों खासकर कर्नाटक में उन्हें विशेष सम्मान हासिल है और उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष के पहले ही रानी चेनम्मा ने युद्ध में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। हालांकि उन्हें युद्ध में कामयाबी नहीं मिली और उन्हें कैद कर लिया गया। अंग्रेजों के कैद में ही रानी चेनम्मा का निधन हो गया।
 चेन्नम्मा का अर्थ होता है सुंदर कन्या। इस सुंदर बालिका का जन्म 1778 ई. में दक्षिण के काकातीय राजवंश में हुआ था। पिता धूलप्पा और माता पद्मावती ने उसका पालन-पोषण राजकुल के पुत्रों की भांति किया। उसे संस्कृत भाषा, कन्नड़ भाषा, मराठी भाषा और उर्दू भाषा के साथ-साथ घुड़सवारी, अस्त्र शस्त्र चलाने और युद्ध-कला की भी शिक्षा दी गई।
चेन्नम्मा का विवाह कित्तूर के राजा मल्लसर्ज के साथ हुआ। कित्तूर उन दिनों मैसूर के उत्तर में एक छोटा स्वतंत्र राज्य था। परन्तु यह बड़ा संपन्न था। यहां हीरे-जवाहरात के बाजार लगा करते थे और दूर-दूर के व्यापारी आया करते थे। चेन्नम्मा ने एक पुत्र को जन्म दिया, पर उसकी जल्दी मृत्यु हो गई। कुछ दिन बाद राजा मल्लसर्ज भी चल बसे। तब उनकी बड़ी रानी रुद्रम्मा का पुत्र शिवलिंग रुद्रसर्ज गद्दी पर बैठा और चेन्नम्मा के सहयोग से राजकाज चलाने लगा। शिवलिंग के भी कोई संतान नहीं थी। इसलिए उसने अपने एक संबंधी गुरुलिंग को गोद लिया और वसीयत लिख दी कि राज्य का काम चेन्नम्मा देखेगी। शिवलिंग की भी जल्दी मृत्यु हो गई।
अंग्रेजों की नीति डाक्ट्रिन आफ लैप्स के तहत दत्तक पुत्रों को राज करने का अधिकार नहीं था। ऐसी स्थिति आने पर अंग्रेज उस राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लेते थे। कुमार के अनुसार रानी चेनम्मा और अंग्रेजों के बीच हुए युद्ध में इस नीति की अहम भूमिका थी। 1857 के आंदोलन में भी इस नीति की प्रमुख भूमिका थी और अंग्रेजों की इस नीति सहित विभिन्न नीतियों का विरोध करते हुए कई रजवाड़ों ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था। डाक्ट्रिन आफ लैप्स के अलावा रानी चेनम्मा का अंग्रेजों की कर नीति को लेकर भी विरोध था और उन्होंने उसे मुखर आवाज दी। रानी चेनम्मा पहली महिलाओं में से थीं जिन्होंने अनावश्यक हस्तक्षेप और कर संग्रह प्रणाली को लेकर अंग्रेजों का विरोध किया।
 अंग्रेजों की नजर इस छोटे परन्तु संपन्न राज्य कित्तूर पर बहुत दिन से लगी थी। अवसर मिलते ही उन्होंने गोद लिए पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया और वे राज्य को हड़पने की योजना बनाने लगे। रानी चेन्नम्मा ने सन् 1824 में (सन् 1857 के भारत के स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम से भी 33 वर्ष पूर्व) उन्होने हड़प नीति (डॉक्ट्रिन आफ लेप्स) के विरुद्ध अंग्रेजों से सशस्त्र संघर्ष किया था।
आधा राज्य देने का लालच देकर उन्होंने राज्य के कुछ देशद्रोहियों को भी अपनी ओर मिला लिया। पर रानी चेन्नम्मा ने स्पष्ट उत्तर दिया कि उत्तराधिकारी का मामला हमारा अपना मामला है, अंग्रेजों का इससे कोई लेना-देना नहीं। साथ ही उसने अपनी जनता से कहा कि जब तक तुम्हारी रानी की नसों में रक्त की एक भी बूंद है, कित्तूर को कोई नहीं ले सकता। रानी का उत्तर पाकर धारवाड़ के कलेक्टर थैकरे ने 500 सिपाहियों के साथ कित्तूर का किला घेर लिया। 23 सितंबर, 1824 का दिन था। किले के फाटक बंद थे। थैकरे ने बस कुछ मिनट के अंदर आत्मसमर्पण करने की चेतावनी दी। इतने में अकस्मात किले के फाटक खुले और दो हजार देशभक्तों की अपनी सेना के साथ रानी चेन्नम्मा मर्दाने वेश में अंग्रेजों की सेना पर टूट पड़ी। थैकरे भाग गया। दो देशद्रोही को रानी चेन्नम्मा ने तलवार के घाट उतार दिया। अंग्रेजों ने मद्रास और मुंबई से कुमुक मंगा कर 3 दिसंबर, 1824 को फिर कित्तूर का किला घेर डाला। परन्तु उन्हें कित्तूर के देशभक्तों के सामने फिर पीछे हटना पड़ा। दो दिन बाद वे फिर शक्तिसंचय करके आ धमके। छोटे से राज्य के लोग काफी बलिदान कर चुके थे। चेन्नम्मा के नेतृत्व में उन्होंने विदेशियों का फिर सामना किया, पर इस बार वे टिक नहीं सके। रानी चेन्नम्मा को अंग्रेजों ने बंदी बनाकर जेल में डाल दिया। उनके अनेक सहयोगियों को फांसी दे दी। कित्तूर की मनमानी लूट हुई। 21 फरवरी 1829 ई. को जेल के अंदर ही इस वीरांगना रानी चेन्नम्मा का देहांत हो गया।
भले ही रानी चिन्नम्मा अंग्रेजों को परास्त ना कर पायी हो लेकिन मातृभूमि के प्रति अपने प्रेम और अपनी वीरता के कारण अंग्रेज उनके विश्वास को अडिग नहीं कर पाए। स्त्री के साहस की मिसाल रानी चिन्नम्मा भले ही इतिहास के पन्नों में समा गई हों लेकिन उनका जीवन और साहस उन्हें उन विजित राजाओं से कहीं ऊपर रखता है जो आत्मसम्मान और गुलामी की कीमत पर अपनी साख और राज्य को बचाकर रखते हैं।
प्रस्तुति सर्जना चतुर्वेदी

Tuesday, 7 January 2014

शक्ति का अवतार थीं शांति - सुनीति


शक्ति का अवतार थीं शांति - सुनीति
कहते हैं कि स्त्री यदि वात्सल्य की देवी है तो वह रणचण्डी का रूप भी धारण कर लेती है। वह ममता की मूरत है तो वह शक्ति स्वरूपा भी है। स्त्री यदि सृजक है तो वह दुष्ट नासिनी भी है। नारी जाति की महानता को लेकर हर दौर में अलग-अलग बातें कही गई हैं। देश के लिए मर मिटने और त्याग देने में भी देश की महिलाओं ने अपना अविस्मरणीय योगदान दिया है। बस अंतर यह है कि कुछ का योगदान नजर आ गया तो कुछ इतिहास के पन्नों में अपना योगदान देकर भारत मां के चरणों में खुद को समर्पित करके वहीं शांत हो गईं। ऐसी ही गाथा है शांति घोष और सुनीति चौधरी जैसी भारत मां की दो सपूतनियों की जिनके बारे में भले आज हिंदुस्तानियों को शायद पता भी ना हो मगर उनका योगदान भुलाने लायक नहीं है।
 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे छोटी उम्र की क्रांतिकारी तरुणियों के बारे में जानते हैं। भगत सिंह की फांसी का बदला लेने के लिए भारत की आजादी के क्रांतिकारी इतिहास की सबसे तरुण बालाएं शांति घोष और सुनीति चौधरी ने 14 दिसम्बर 1931 को त्रिपुरा के कोमिल्ला के जिला मजिस्ट्रेट स्टीवन को गोली मार दी। इन युवा लड़कियों के साहसिकता पूर्ण कार्य से संपूर्ण देश अचंभित और रोमांचित था।
स्वामी विवेकानंद ने एक बार भारतीय युवकों का आह्वान किया, मत भूलो कि तुम्हारा जन्म मातृभूमि की वेदी पर स्वयं को बलिदान करने के लिए हुआ है। एक दिन किसको पता था कि स्वामी जी की नजदीकी बहन की पोती शांति घोष स्वामी जी के इस सन्देश के लिए अपना किशोर जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर देगी। शांति घोष 22 नवम्बर 1916 को कलकत्ता में पैदा हुई। उनके पिता देवेन्द्र नाथ घोष मूल रूप से बारीसाल जिले के थे, कोमिल्ला कॉलेज में प्रोफेसर थे। उनकी देशभक्ति की भावना ने शांति को कम उम्र से ही प्रभावित किया।
शांति की ऑटोबायोग्राफी पर प्रसिद्ध  क्रांतिकारी बिमल प्रतिभा देवी ने लिखा बंकिम की आनंद मठ की शांति जैसी बनना। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने लिखा, नारीत्व की रक्षा के लिए, तुम हथियार उठाओ, हे माताओ..इन सबके के आशीर्वाद ने युवा शांति को प्रेरित किया और उसने स्वयं को उस मिशन के लिए तैयार किया। जब वह फज़ुनिस्सा गल्र्स स्कूल की छात्रा थी तो अपनी सहपाठी प्रफुल्ल नलिनी के माध्यम से युगांतर पार्टी में शामिल हुई और क्रांतिकारी कार्यों के लिए आवश्यक प्रशिक्षण लिया और जल्द ही वह दिन आया उन्होंने अपना युवा जीवन मुस्कुराते हुए बहादुरी से मातृभूमि को समर्पित कर दिया।
14 दिसम्बर 1931 को अपनी सहपाठी सुनीति चौधरी के साथ  कोमिल्ला के जिला मजिस्ट्रेट स्टीवन को गोली मार दी। इन युवा लड़कियों के साहसिकता पूर्ण कार्य से संपूर्ण देश अचंभित और रोमांचित था। लाखों देशवासियों की प्रशंसा और स्नेह को साथ लेकर शांति अपनी साथी सुनीति के साथ आजीवन कारावास के लिए चली गयी। जेल में शांति और सुनीति को कुछ समय अलग रखा गया। यह एकांत  कारावास चौदह साल की लड़कियों के लिए दुखी कर देने वाला था। 1937 में उन्हें कई राजनैतिक कैदियों के साथ शीघ्र रिहाई मिली। उन्होंने फिर से अपनी पढ़ाई शुरू की। 1942 में उन्होंने चटगांव के एक भूतपूर्व क्रांतिकारी कार्यकर्ता चितरंजन दास से शादी की... शांति एक लम्बे समय (1953 -1968 ) तक पश्चिम बंगाल विधान परिषद् और विधानसभा की सदस्या रहीं। उनकी आत्मकथा पुस्तक अरुनबानी ने बहुत प्रशंसा प्राप्त की थी। 28 मार्च 1989 को श्रीमती शांति घोष (दास) ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
उन्हीं की दूजी साथी सुनीति चौधरी  स्वतंत्रता संग्राम में एक असाधारण भूमिका निभाने वाली का जन्म मई 22, 1917 पूर्वी बंगाल के त्रिपुरा जिले के इब्राहिमपुर गांव में एक साधारण हिंदू मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता चौधरी उमाचरण सरकारी सेवा में थे और मां सुरससुन्दरी चौधरी, एक शांत और पवित्र विचारों वाली औरत थी जिन्होंने सुनीति के तूफानी कैरियर पर एक गहरा प्रभाव छोड़ा। जब वह कच्ची उम्र में स्कूल में थी तो उसके दो बड़े भाई कॉलेज में क्रांतिकारी आन्दोलन में थे। सुनीति युगांतर पार्टी में अपनी सहपाठी प्रफुल्ल नलिनी द्वारा भर्ती की गई थी। कोमिल्ला में सुनीति छात्राओं के स्वयंसेवी कोर की कप्तान थी। उनके शाही अंदाज और नेतृत्व करने के तरीके ने जिले के क्रांतिकारी नेताओं का ध्यान खींचा। सुनीति को गुप्त राइफल ट्रेनिंग और हथियार (छुरा) चलाने के लिए चुना गया। इसके तुरंत बाद वह अपनी सहपाठी शांति घोष के साथ एक प्रत्यक्ष कार्रवाई के लिए चयनित हुई और यह निर्णय लिया गया कि उन्हें सामने आना ही चाहिए। एक दिन 14 दिसंबर 1931 दोनो लड़कियां कोमिल्ला के जिला मजिस्ट्रेट स्टीवन के बंगले पर तैराकी क्लब की अनुमति की याचिका लेकर गई और जैसे ही स्टीवन सम्मुख आया उस पर पिस्तोल से गोलियां दाग दी। सुनीति के रिवोल्वर की पहली गोली से ही वो मर गया.. इसके बाद उन लड़कियों को गिरफ्तार कर किया गया और निर्दयता से पीटा गया। कोर्ट में और जेल में वो लड़कियां खुश रहती थी। गाती रहती थी और हंसती रहती थी। उन्हें एक शहीद की तरह मरने की उम्मीद थी, लेकिन उनके नाबालिग होने ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा दिलाई। हालांकि वो थोड़ा निराश थी लेकिन उन्होंने इस निर्णय को ख़ुशी से और बहादुरी से लिया और कारागार में प्रवेश किया, कवि नाज़ुरल के प्रसिद्ध गीत ओह, इन लोहे की सलाखों को तोड़ दो, इन कारागारों को जला दो. को गाते हुए..
सात साल बाद रिहाई मिलने के बाद उन्होंने निडर भावना के साथ संघर्ष भरे जीवन का सामना किया और फिर से अपनी पढ़ाई शुरू की और ग्रेजुएशन
की डिग्री हासिल की और 1947 में प्रद्योत घोष से शादी कर ली, उनके एक पुत्री हुई। 1994 में श्रीमती सुनीति चौधरी (घोष) का स्वर्गवास हुआ।
भारत मां की शांति और सुनीति जैसी बेटियों ने देश को अपना सर्वस्व मानकर कच्ची उम्र में जो योगदान दिया वह ना सिर्फ काबिल ए तारीफ है बल्कि वह नमन और वंदनीय है और जो लोग स्त्री का आकलन सिर्फ अबला के रूप में करते हैं, उनके लिए एक सशक्त और सटीक जवाब भी है।
प्रस्तुति सर्जना चतुर्वेदी

क्या पता कल सुबह मेरी हो ना हो..

बचपन से ठंड का मौसम बहुत भाता था क्योंकि तब खुद की खुशी ही सब कुछ होती थी लेकिन अब वही ठंड का मौसम आता है तो आंखों में यह सोचकर आंसू आ जाते हैं कि उनका क्या होगा जिनकी छत आसमान है और जमीन बिस्तर...। उनके लिए गर्म मफलर, स्वेटर या जेकेट कौन लाकर देगा जो सर्दी की हर रात को जिंदगी की आखिरी रात बनाने की ख्वाहिश ऊपर वाले से करते हैं।
सर्दी में उस घर का क्या होगा जिसकी दीवार भी चंद ईटों को रखकर बनाई गई है, इसलिए जब भी सर्दियां आती हैं तो भले ही वह बगीचों को फूलों से महका देती हैं या फिर खेतों में खूबसूरत फसलें लहलहा देती हैं। हमें फैंसी स्वेटर खरीदने का मौका दे देती हैं लेकिन ईश्वर के कितने ही वंदों की जिंदगी को बदतर बना देती हैं, जरा उनकी भी सोच लो तो रूह कांप जाती है और मन करता है कहूं
ए खुदा ठंड का यह मौसम किसी सितम से कम नहीं...
क्योंकि क्या पता कल सुबह मेरी हो ना हो...
सर्जना चतुर्वेदी

Saturday, 28 December 2013

सूचना क्रांति के अस्त्र का सटीक प्रयोग

सूचना क्रांति के अस्त्र का सटीक प्रयोग

प्रदेश को दी पहले ऑनलाइन जनसंपर्क कार्यालय की सौगात

हमारे आसपास मौजूद संसाधन तो हैं लेकिन जब तक हम उनका उपयोग नहीं करेंगे तो उनके कोई मायने नहीं है और उपयोग करने के लिए जरूरी है कि हमें उसके संबंध में जानकारी हो और हम जागरूक हों। जानकारी और जागरूकता के संयोग से ही मनुष्य संविधान में मिले अपने अधिकारों का उपयोग कर सकता है और उसकी ही वजह से व्यक्ति सरकार द्वारा दी गई सुविधाओं का लाभ उठा सकता है। सूचना और तकनीक के इस युग में एक क्लिक पर सबकुछ मौजूद है लेकिन उस एक क्लिक को हमारे लिए कहां करना बेहतर होगा यह भी मायने रखता है। सूचना की इस बेहतर तकनीक का प्रयोग जन संवाद के हित में किया जनसंपर्क बुरहानपुर से अपनी जिला जनसंपर्क अधिकारी की नौकरी की शुरूआत करने वाले 25 वर्षीय सुनील वर्मा ने। वर्तमान में खंडवा जिला जनसंपर्क कार्यालय का दायित्व संभाल रहे सुनील वर्मा ने जनसंपर्क बुरहानपुर के कार्यालय को प्रदेश का पहला ऑनलाइन जनसंपर्क कार्यालय बनाकर इस बात का प्रमाण प्रस्तुत किया कि जरूरी नहीं कि बेहतर संसाधन और सुविधाएं हो तभी कोई व्यक्ति या संस्थान बेहतर ढंग से कार्यों को अंजाम दे सकता है। काम करने का जज्बा हो तो सीमित संसाधनों के साथ भी बेहतर ढंग से कार्यों को पूरा किया जा सकता है। जहां संसाधनों के नाम पर जब कुछ नहीं था उस समय ऑनलाइन जनसंपर्क कार्यालय को स्थापित करने का काम 2 वर्ष पहले ही पूरा कर लिया।
ऑनलाइन खबरों से बनाया बेहतर संवाद
कहते हैं कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है। ऐसे में जब सुनील वर्मा ने जनसंपर्क बुरहानपुर का दायित्व संभाला था, तब  वहां पर जनसंपर्क का ना ही कोई कार्यालय था और ना ही स्टाफ। ऐसी परिस्थिति में परंपरागत ढंग से प्रेस रिलीज एक-एक समाचार पत्र के कार्यालय में पहुंचाना संभव नहीं था, इसलिए संसाधनों के अभाव को देखते हुए और आज के हाइटेक मीडिया की जरूरतों को समझते हुए अपने कार्यालय को पूरी तरह ऑनलाइन बनाने का निर्णय लिया। इसलिए भले ही आज तक जनसंपर्क बुरहानपुर द्वारा एक भी प्रेस नोट की कॉपी जिले के किसी समाचार पत्र के दफ्तर में हार्ड कॉपी के रूप में ना पहुंचती हो लेकिन ई मेल पर खबरें जरूर सुनिश्चतता के साथ पहुंचने का क्रम जारी है। वैसे भी कलम से की बोर्ड और कागज से मॉनीटर तक का सफर कर रहे पत्रकारों को ईमेल से सॉफ्ट कॉपी के रूप में खबर मिलने से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के प्रहरियों का टाइप करने का वक्त भी बच जाता है और जिला प्रशासन और शासन की योजनाओं से जुड़े यह समाचार समाचार पत्रों में सहजता के साथ अपनी जगह भी बना लेते हैं।
पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान
परंपरागत प्रेस रिलीज सिस्टम को खत्म कर इससे न सिर्फ पेपर की बचत कर पर्यावरण संरक्षण की मुहिम में अपना योगदान भी दे रहा है और इसके साथ ही कर्मचारी के हाथों प्रेस नोट भेजने पर होने वाले समय और पैसे के खर्च को भी बचा रहा है। इसके साथ ही सूचना तकनीक के उपयोग की दिशा में सभी पत्रकार बंधुओं को वे टू एसएमएस अलर्ट सुविधा के माध्यम से खबरें भेजने के पहले मोबाइल पर एसएमएस भेजने का काम भी किया जाता है।
नवाचार की ओर बढ़ते कदम
बुरहानुपर जनसंपर्क कार्यालय प्रदेश का पहला अॅानलाइन जिला जनसंपर्क कार्यालय बनने का दर्जा हासिल कर चुका हैै। अपने इस ब्लॉग के माध्यम से केवल जिले ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश और देश में बुरहानपुर से जुड़ी खबरें जानने के इच्छुक लोगों की मदद हो रही है। खास बात यह है कि इस ब्लॉग का निर्माण 8 दिसंबर दिसंबर 2011 को सुनील वर्मा द्वारा किया गया था लेकिन ब्लॉग के निर्माण के लिए जो जोश था, वह जोश दो साल बाद भी कम नहीं हुआ है। आज भी दो वर्ष बाद भी जिले से जुड़ी सभी खबरें इस ब्लॉग पर उसी निरंतरता के साथ पढ़ी जा सकती हैं। साथ ही शासन की योजनाओं की समस्त जानकारी से लेकर उनसे जुड़े फार्म भी यहां मौजूद हैं। इससे शासन से जुड़ी योजनाओं का हितग्राही सीधे लाभ ले सकते हैं। 
फेसबुक पर दस्तक
किसी भी चीज का उपयोग आपको कैसे करना यह उस वस्तु पर नहीं बल्कि स्वयं आप पर निर्भर करता है। विश्व की सर्वाधिक लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग साइट का प्रयोग कुछ लोगों ने यदि अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए किया तो कुछ ने इसके माध्यम से देश से निरंकुशता को हटाकर लोकतंत्र की स्थापना में उपयोग किया। पुराने दोस्तों से जुडऩे सूचनाओं को एक-दूसरे तक पहुंचाने और विचारों को मंच देने वाले इस सोशल प्लेटफार्म के महत्व को देखते हुए बुरहानपुर जनसंपर्क कार्यालय भी इस सोशल नेटवर्किंग साइट से जुड़ा। ताकि इस सोशल प्लेटफार्म से जुड़े लोगों को प्रदेश सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और नीतियों से अवगत कराया जा सके, साथ ही जिला प्रशासन के महत्वपर्ण जनहितैषी निर्णय और कार्यों की जानकारी इस न्यू मीडिया तकनीक के माध्यम से भी लोगों तक पहुंच सके। बुरहानपुर के तत्कालीन जनसंपर्क
अधिकारी सुनील वर्मा ने बुरहानपुर जनसंपर्क का फेसबुक पर अकांउट
5 अगस्त से फेसबुक पर बनाया।
लोगों तक जनसंपर्क कार्यालय की सूचनाओं को पहुंचाने के लिए इस सोशल नेटवर्किंग साइट पर 22 अगस्त 2012 को फेसबुक पर जनसंपर्क विभाग बुरहानपुर के अलग पेज का निमार्ण किया गया।   https://www.facebook.com/jansampark.burhanpur के यू.आर.एल नाम से बनाये गये इस पेज पर यूनीकोड फोंट में बुरहानपुर जिला प्रशासन द्वारा जनहित में लिए जाने वाले निर्णयों, जनहितेषी कार्यो और प्रदेश सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी दी जाती है। बुरहानपुर जनसपंर्क की फेसबुक पर लोकप्रियता को देखते हुए जनसंपर्क बड़वानी, जनसंपर्क खंडवा, जनसंपर्क देवास समेत कई जिलों के जनसंपर्क कार्यालयों ने भी इसका अनुकरण कर अपने कार्यालय को भी फेसबुकिया बनाकर जानकारी देना शुरू कर दिया है।
जनसरोकार और जनजागरूकता की पहल है - बुरहानपुर निर्माण
सूचना देने के साथ ही लोगों को जागरूक करने में समाचार पत्रों के योगदान के बारे में कुछ कहना दीये को रोशनी दिखाने के समान सा लगता है। प्रताप के समय गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर शहीद ए आजम भगतसिंह ने भी आजादी के आंदोलन में अखबार के माध्यम से देश की आजादी के लिए क्रांतिकारियों को संदेश पहुंचाने का काम किया तो अपनी सशक्त कलम से अंग्रेजों की दुखती रग पर हाथ रखने का काम आजादी के आंदोलन में दादा माखनलाल चतुर्वेदी जैसे कलमकारों ने किया। समाचार पत्र न सिर्फ लोगों को अवगत कराता है। समाचार पत्र के इतिहास से लेकर अब तक जारी महत्व को समझते हुए नवाचार और रचनात्मक कार्य के लिए प्रतिबद्ध जनसंपर्क बुरहानपुर ने बुरहानपुर निर्माण ई पेपर का आगाज भी बुरहानपुर कलेक्टर आशुतोष अवस्थी के मार्गदर्शन में किया।
खबरों का संसार ऑन
सूचना तकनीक के उपयोग का यह कारवां यहां भी रूका नहीं जी हां वेबसाइट निर्माण का नवाचार करते हुए बुरहानपुर से सरोकार अब एक क्लिक पर ला दिया इस लिंक के माध्यम से   https://sites.google.com/site/0dproburhanpur/home
इतिहास में अपनी खास पहचान रखने वाला दक्षिण का द्वार बुरहानपुर सूचना तकनीक के क्षेत्र में भी अब अपनी छवि गढ़ रहा है। इस वेबसाइट के माध्यम से जिले से जुड़ी सभी जानकारी अब कहीं भी बैठे-बैठे  पर एक क्लिक करके ली जा सकती हैं।  बुरहानपुर जनसंपर्क की इस नव सृजित वेबसाइट में एक क्लिक पर ही देश के सभी भाषाओं के सभी समाचार चौनलों के खबरें देखी जा सकती हैं। इसके साथ ही हमारे देश में प्रकाशित समस्त भाषाओं के समाचार पत्रों को भी इस वेबसाइट पर मौजूद लिंक के माध्यम से ऑनलाइन पढ़ा जा सकता है।
चुनावी समर में भी खास रही सूचना तकनीक
लोकतंत्र के महापर्व में सूचना तकनीक का कैसे बखूबी प्रयोग किया जाए। वह भी बुरहानपुर जनसंपर्क कार्यालय के कामकाज में देखा गया, यहां निर्वाचन से जुड़ी समस्त जानकारी एक अलग ब्लॉग और फेसबुक अकाउंट के माध्यम से दी गई, जिससे मीडिया से जुड़े लोगों से लेकर चुनाव में रूचि रखने वाले मतदाताओं को जानकारी आसानी से प्राप्त हुई।
नई तकनीक से जुड़ता खंडवा जनसंपर्क
हाल ही में खंडवा जिला जनसंपर्क कार्यालय का पदभार संभालने के बाद युवा जनसंपर्क अधिकारी सुनील वर्मा अपने नवाचारों की जिस कड़ी को सूर्य पुत्री ताप्ती नगरी से शुरू किया था। उसे वह अपनी सोच और ऊर्जा के साथ आगे भी जारी रखना चाहते हैं। यहां भी कार्यालय संभालने के बाद खंडवा जनसंपर्क का ब्लॉग बनाने, खंडवा जनसंपर्क कार्यालय का निर्वाचन संबंधी फेसबुक अकाउंट बनाकर सूचनाओं के समुद्र से खबर रूपी मोतियों को चुनकर संपादित करने का काम यहां भी जारी है।
प्रस्तुति सर्जना चतुर्वेदी

Saturday, 21 December 2013


शेरनी का पु़त्र हंसते हुए बढ़ा फांसी के त ते पर
शहीद दिवस ाुदीराम बोस 11 अगस्त

आजादी की लड़ाई का इतिहास क्रांतिकारियों के त्याग और बलिदान के अनगिनत कारनामों से भरा पड़ा है। क्रांतिकारियों की सूची में ऐसा ही एक नाम है खुदीराम बोस का,कुछ इतिहासकार उन्हें देश के लिए फांसी पर चढऩे वाला सबसे कम उम्र का देशभक्त मानते हैं। खुदीराम का जन्म तीन दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में त्रैलोक्यनाथ बोस के घर हुआ था। खुदीराम बोस जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो
गया था। खुदीराम बोस की बड़ी बहन
अनुरूपादेवी और बहनोई अमृतलाल को, खुदीराम के पालनपोषण का उत्तर- दायित्व नि ााया। आनंदमठ उपन्यास पढ़ते ही उसे अपने जीवन - कार्य की दृष्टि मिली। मातृभूमि की सेवा में उन्होंने अपने जीवन - समर्पण का निश्चय किया। सत्येन बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया था। बोस को ग़ुलामी की बेडिय़ों से जकड़ी भारत माता को आजाद कराने की ऐसी लगन लगी कि उन्होंने नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और सिर पर कफन बांधकर जंग-ए-आज़ादी में कूद पड़े। वह रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और वंदेमातरम पंफलेट वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फरवरी 1906,
बंगाल के मेदिनीपुर शहर में एक विशाल प्रदर्शनी आयोजित की गयी थी। अंग्रेज
राज्यकर्ताओं के अन्याय पर पर्दा डालना यही इस प्रदर्शनी का उद्देश्य था। उस प्रदर्शनी में
ऐसी वस्तुएं, चित्र तथा कठपुतलियां रखी हुई थी, जिनसे आभास हो कि अंग्रेज राज्यकर्ता जो विदेश से आये थे, भारत को बहुत सहायता दे रहे हैं। इस प्रदर्शनी को देखने बहुत भीड़
इक्ट्ठा हुई थी। उस समय एक सोलह वर्षीय युवक लोगों को परचा बांटते हुए दिखाई दिया। उस पर्चे का शीर्षक था सोनार बांगला। उसमें
वन्देमातरम का नारा था, साथ ही साथ उस प्रदर्शनी के आयोजक, अंग्रेजों के वास्तविक हेतु को भी स्पष्ट किया गया था। अंग्रेजों द्वारा किये गए अन्याय तथा क्रूरता का भी उस पर्चे में उल्ले ा था। प्रदर्शनी देखने वाले लोगों में
कुछ लोग इंग्लैंड के राजा के प्रति निष्ठा रखते थे। अंग्रेजो के अन्याय का विरोध करने वाले उस युवक का उन्होंने विरोध किया।
वन्देमातरम  स्वतंत्रता,स्वराज्य, इस प्रकार के शब्द उन्हें सुई की तरह चुभते थे। उन्होंने उस लड़के को पर्चे बांटने से रोका। उन्होंने उस लड़के को डराया धमकाया, पर उनकी उपेक्षा कर उस लड़के ने शांति से पर्चे बांटना जारी रखा। जब कुछ लोग उसे पकडऩे लगे तो वह चालाकी से भाग गया। अंत में एक पुलिस सिपाही ने उस लड़के का हाथ पकड़ा। उसके हाथ से परचे छीन लिए। परन्तु उस लड़के को पकडऩा आसन नहीं था। उसने झटका देकर अपना हाथ छुड़ाया और हाथ घुमा कर सिपाही की नाक पर जमकर घूँसा मारा। उसने परचे फिर उठा लिए और कहा,ध्यान रखो, मुझे स्पर्श मत करो ! मैं देखूंगा कि मुझे वारंट के बगैर पुलिस कैसे पकड़ सकती है। जिस पुलिस सिपाही को घूँसा मारा गया था, वह पुन आगे बढ़ा, किन्तु लड़का वहाँ नहीं था। वह जनसमूह में अदृश्य हो चुका था। जब लोग
वन्देमातरम के नारे लगाने लगे तो पुलिस और राजनिष्ठ लोगों को आश्चर्य हुआ। उन्हें यह अपने लिए अपमानजनक प्रतीत हुआ। बाद में उस लड़के के विरुद्ध एक मुकदमा
चलाया गया लेकिन छोटी उम्र के आधार पर न्यायलय ने उसे मुक्त कर दिया।
जिस वीर लड़के ने मेदिनीपुर की प्रदर्शनी में बहादुरी से परचे बांटकर अंग्रेजों की बुरी योजनाओं को विफल कर दिया, वह खुदीराम बोस था। 16 मई, 1906 को एक बार फिर पुलिस ने उन्हें गिर तार कर लिया, मगर
उनकी छोटी आयु को देखते हुए चेतावनी
देकर उन्हें छोड़ दिया गया था। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के आरंभिक चरण में कई क्रांतिकारी ऐसे थे जिन्होंने ब्रिटिश राज के
विरुद्ध आवाज उठाई। खुदीराम बोस भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष के इतिहास में संभवतया सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी थे, जो भारत मां के सपूत कहे जा सकते हैं। 1905 में
बंगाल विभाजन के विरोध में चले आंदोलन में भी उन्होंने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। उनकी
क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते 28 फरवरी 1906 को उन्हें गिर तार कर लिया गया,
लेकिन वह कैद से भाग निकले। लगभग दो महीने बाद अप्रैल में वह फिर से पकड़े गए। 16 मई 1906 को उन्हें रिहा कर दिया गया। छह दिसंबर 1907 को खुदीराम ने नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया, परंतु गवर्नर बच गया। सन 1908 में खुदीराम ने दो अंग्रेज
अधिकारियों वाट्सन और पै फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया, लेकिन वे भी बच
निकले। खुदीराम बोस मुज फरपुर के सेशन जज किंग्सफोर्ड से बेहद खफा थे जिसने
बंगाल के कई देशभक्तों को कड़ी सजा दी थी।
उन पर वह कई तरह के अत्याचार करता।
क्रांतिकारियों ने उसे मार डालने की ठान ली थी। युगान्तर क्रांतिकारी दल के नेता वीरेन्द्र
कुमार घोष ने घोषणा की कि किग्सफोर्ड को मुज फरपुर में ही मारा जाएगा। इस काम के लिए खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चाकी को
चुना गया। ये दोनों क्रांतिकारी बहुत सूझबूझ वाले थे। इनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। देश भक्तों को तंग करने वालों को मार डालने का काम उन्हें सौंपा गया था। एक दिन वे दोनों मुज फरपुर पहुंच गए। वही एक धर्मशाला में वे आठ दिन रहे। इस दौरान
उन्होंने किंग्सफोर्ड की दिनचर्या तथा
गतिविधियों पर पूरी नजर रखी। उनके बंगले के पास ही क्लब था। अंग्रेजी अधिकारी और उनके परिवार अक्सर सायंकाल वहां जाते थे। 30 अप्रैल, 1908 की शाम किंग्स फोर्ड और उसकी पत्नी क्लब में पहुंचे। रात्रि के साढ़े आठ बजे मिसेज कैनेडी और उसकी बेटी अपनी बग्घी में बैठकर क्लब से घर की तरफ आ रहे थे। उनकी बग्घी का रंग लाल था और वह बिल्कुल किंग्सफोर्ड की बग्घी से मिलती-जुलती थी। खुदीराम बोस तथा उसके साथी ने किंग्सफोर्ड की बग्घी समझकर उस पर बम फेंक दिया। देखते ही देखते बग्घी के परखचे उड़ गए। उसमें सवार मां बेटी दोनों
की मौत हो गई। क्रांतिकारी इस विश्वास से भाग निकले कि किंग्सफोर्ड को मारने में वे सफल हो गए है। खुदीराम बोस और घोष 25 मील भागने के बाद एक रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। इस समय तक मुज फरपुर की
घटना चारों दिशाओं में फैल चुकी थी। जहां खुदीराम बैठे थे, लोगों की चर्चा इसी विषय पर हो रही थी। उत्सुकता से उसने चर्चा सुनी। केवल दो महिलाओं की मृत्यु हुई, यह सुनकर वह अपने आप को भूल गया और उसने पूछा ,क्या किंग्जफोर्ड नहीं मरे? खुदीराम के इन शब्दों से दुकान में बैठे लोगों की दृष्टि उस पर गई। वह लड़का वहां नया दि ा रहा था। उसके चेहरे पर बहुत थकान बहुत दिख रही थी। दुकान का मालिक उसके प्रति सशंक हो उठा। उसने विचार किया कि अपराधी को पकडऩे में सहायता करने पर उसे पुरस्कार मिलेगा। उसने खुदीराम को पानी दिया और सामने जा रहे पुलिस सिपाही को खबर दी। पानी पीने के लिये ग्लास उठाते समय ही पुलिस सिपाही ने उसे पकड़ लिया। खुदीराम अपनी जेब से पिस्तौल नहीं निकाल सका। दोनों पिस्तौलें पुलिस सिपाहियों ने छीन ली, किन्तु खुदीराम नहीं घबराया। प्रफुल्ल भी खुदीराम की तरह भागा था। उसने दो दिन तक पुलिस सिपाहियों को चकमा दिया। किन्तु तीसरे दिन भटकते समय वह पकड़ा गया। पुलिस सिपाहियों को चकमा देकर वह फिर भाग गया। किन्तु चारों ओर पुलिस का जाल फैला था। कुछ भी हो, मैं जीवित होते हुए उन्हें मेरे शरीर को स्पर्श नहीं करने दूंगा - कहते हुए अपनी पिस्तौल
निकाल कर उसने स्वयं पर चला दी और वीरगति प्राप्त की। पुलिस उसका सर काटकर मुज फऱपुर ले गई । खुदीराम को पुलिस की निगरानी में रेल गाड़ी से मुज फऱपुर लाया
गया। जिस भारतीय लड़के ने अंग्रेजों पर पहला बम फेंका था, उसे देखने हजारों लोग इकट्टा हुए। पुलिस स्टेशन जाने के लिये पुलिस की गाड़ी में बैठते समय खुदीराम हंसकर
चिल्लाए वन्देमातरम! गर्व से आँसुओं की धारा लोगों की आँखों से झरने लगी। खुदीराम के विरुद्ध एक अभियोग चलाया गया। सरकार के पक्ष में दो वकील थे। मुज फरपुर शहर में खुदीराम के पक्ष में कोई भी न था। अंत में
कालिदास बोस नामक वकील खुदीराम की सहायता हेतु आये। यह मुकदमा दो मास तक चला। अंत में खुदीराम को मृत्यु दंड मिला। मृत्यु दंड का निर्णय सुनते समय भी खुदीराम के चेहरे पर मुस्कान थी।
न्यायाधीश को आश्चर्य हुआ कि मृत्युदंड होते हुए भी यह 19 वर्षीय लड़का शांत कैसे हो सकता है। जज ने ाी कहा था कि शेरनी का वह पुत्र हंसते हुए फांसी के त ते पर चढ़ा
था। क्या तुम इस निर्णय का अर्थ जानते हो न्यायाधीश ने पूछा । खुदीराम हंसकर बोले इसका अर्थ मैं आपसे अधिक अच्छी तरह जानता हूं।
तु हे कुछ कहना है? बम किस प्रकार से बनता है, यह मैं स्पष्ट करना चाहता हूं
न्यायाधीश को डर था कि कोर्ट मैं बैठे सारे लोगों को बम तैयार करने की जानकारी यह खुदीराम देगा। इसलिए उसने खुदीराम को बोलने की अनुमति नहीं दी। खुदीराम को अंग्रेजों के न्यायालय से न्याय की आशा थी ही नहीं। किन्तु कालिदास बोस की खुदीराम को बचाने की इच्छा थी। उन्होंने खुदीराम की ओर से कलकत्ता हाइकोर्ट में याचिका दाखिल की। कलकता हाइकोर्ट के न्यायाधीश भी खुदीराम के स्वभाव को जानते थे। निर्भय आंखों वाले दृढ निश्चयी खुदीराम को देख कर उन्हें भी आश्चर्य हुआ। उन्होंने भी खुदीराम को मृत्युदंड ही दिया जो कनिष्ठ कोर्ट ने दिया था। किन्तु उन्होंने खुदीराम के फांसी का दिन 6 अगस्त से 19 अगस्त 1908 तक बढ़ा दिया। तु हें कुछ कहने की इच्छा है? पुन: पूछा गया। खुदीराम ने कहा,राजपूत वीरों की तरह मेरे देश की स्वाधीनता के लिये मैं मरना चाहता हूं। फांसी के विचार से मुझे जरा भी दु:ख नहीं हुआ है। मेरा एक ही दु:ख है कि किंग्ज फोर्ड को उसके अपराध का दंड नहीं मिला।
कारागृह में भी उन्हें चिंता नहीं थी। जब मृत्यु उनके पास पहुंची, तो भी उनके मुख पर चमकथी। उन्होंने सोचा कि जितनी जल्दी मैं मेरा जीवन मातृभूमि के लिये समर्पित करूँगा, उतनी ही जल्दी मेरा पुन: जन्म होगा। यह कोई पौराणिक कथा नहीं है। मृत्युदंड के निर्णय के अनुसार 11 अगस्त 1908 को सुबह 6 बजे खुदीराम को फांसी के त ते के पास लाया
गया। उस समय भी उनके चेहरे की मुस्कान
कायम थी। शांति से वह उस स्थान पर गया। उसके हाथ में भगवतगीता थी। अंत में एक ही बार उन्होंने वन्देमातरम कहा और उसे फांसी लगी। अंत में खुदीराम ने अपना ध्येय प्राप्त
किया। उन्होंने अपना जीवन मातृभूमि के
चरणों पर समर्पित कर दिया। भारत के इतिहास में वह अमर है। देश के लिए जान देने की प्रसन्नता के कारण फांसी के दिन 11 अगस्त, 1908 को खुदीराम बोस का वजन दो पौण्ड़ बढ़ गया था। प्रात: 06 बजे उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया था। गंड़क नदी के तट पर खुदीराम बोस के वकील कालीदास मुखर्जी ने उनकीचिता में आग लगाई। हजारों की सं या में युवकों का समूह एकत्रित था। चिता की आग से निकली चिंगारियां स पूर्ण भारत में
फैली। चिता की भस्मी को लोगों ने अपने माथे पर लगाया, पुडिय़ा बांध कर घर ले गये। खुदीराम बोस ही प्रथम क्रांतिवीर हैं जिन्होंने बीसवीं सदी में आजादी के लिए फांसी के त ते पर अपने प्राणों की आहुति दी थी। मुज फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें
फांसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फांसी केत ते की ओर बढ़ा था। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे उनके नाम की एक खास किस्म की धोती बुनने लगे। उनकी शहादत से समूचे देश में देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी थी। उनके साहसिक योगदान को अमर करने के लिए
गीत रचे गए और उनका बलिदान लोकगीतों के रूप में मुखरित हुआ। उनके स मान में भावपूर्ण गीतों की रचना हुई जिन्हें बंगाल के लोक गायक आज भी गाते हैं। इतिहासकार शिरोल के अनुसार- बंगाल के राष्ट्रवादियों के लिए वह शहीद और अधिक अनुकरणीय हो गया। विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों ने शोक मनाया। स्कूल-कॉलेज बंद रहे और नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था। खुदीराम बोस को भारत की स्वतंत्रता के लिए संगठित
क्रांतिकारी आंदोलन का प्रथम शहीद माना जाता है। अपनी निर्भीकता और मृत्यु तक को सोत्साह वरण करने के लिए वे घर-घर में श्रद्धापूर्वक याद किए जाते हैं। यह एक ऐसे वीर की जीवन गाथा है, जिसने भारत को रौदने वाले अंग्रेजों पर पहला बम फेंका था।
ाुदीराम बोस ने कहा था भारत माता ही मेरे लिए माता-पिता और सब कुछ है। उसके लिये मेरा जीवन समर्पित करना मेरे लिए गौरव का विषय होगा। मेरी एकमात्र इच्छा यही है -अपने देश को स्वाधीनता मिलते तक मैं पुन:
पुन: यही जन्म लूं और पुन: पुन: जीवन को बलिवेदी पर चढ़ाऊं।