SARJANA CHATURVEDI

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Saturday, 14 June 2014

करके देखिए अच्छा लगता है.

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अंतर्राष्ट्रीय रक्तदान दिवस 14 जून
आज का युवा जागरूक है और उसकी जागरूकता और जोश को अब हम हर पल महसूस कर सकते हैं। हाल ही में भारत में हुए इलेक्शन में भी देश की इस युवा आबादी ने अपने वोट की कीमत समझते हुए सरकार को चुना है और इसके पीछे सबसे बड़ी ताकत है अवेयरनेस की। जिसका असर अब हर क्षेत्र में देखने को मिलने लगा है। अक्सर खून के रिश्तों को एक परिवार से जोड़कर देखा जाता है लेकिन यह रिश्ता उन लोगों के बीच भी बन जाता है। जब एक ने खून देकर दूसरे को जिंदगी दी हो, और यह रिश्ता ना ही जन्म से जुड़ा होता है, न मजहब से और न किसी स्वार्थ से लेकिन जिंदगी को देने वाला वह अनजाना जरूरतमंद परिवार के लिए अपना बन जाता है। यह रिश्ता जुड़ता है खून से, यह रिश्ता जुड़ता है रक्त दान से। ब्लड डोनेशन या रक्तदान के बारे में जानते तो हम सभी हैं लेकिन इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने में सोशल मीडिया जनरेशन ने महती भूमिका निभाई है, आज किसी को ब्लड की जरूरत होती है, तो वॉट््सएप, फेसबुक जैसी सोशल साइट्स के माध्यम से दोस्तों के बीच यह मैसेज दे देते हैं और जरूरतमंद की जान भी बच जाती है। यह है सोशल मीडिया की ताकत।
विश्व रक्तदान दिवस हर साल 14 जून को मनाया जाता है। ब्लड ग्रुप सिस्टम की खोज करने वाले कार्ल लेंसियर के जन्मदिन की खुशी में यह दिन हर साल सेलिब्रेट किया जाता है।
अभी भी है दरकार
१९९७ में वल्र्ड हैल्थ ऑर्गनाइजेशन ने विकसित देशों के लिए स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए एक लक्ष्य निर्धारित किया था। १२४ में से महज ४९ देश उस लक्ष्य को सर्वे के अनुसार पूरा कर पाए थे। अस्पतालों में हर दिन रक्तदान की जरूरत होती है। एक साल में 8० मिलीयन यूनिट ब्लड डोनर और पेड डोनर के द्वारा किया जाता है। जो जरूरत की तुलना में काफी कम है। विकासशील देशों में यह स्थिति और भी चिंताजनक है। क्योंकि वहां महज ३८ फीसदी रक्तदान होता है जबकि दुनिया की ८२ फीसदी आबादी वहां निवास करती है, जो रक्तदान की कमी के कारण अधिकांशत: पेड डोनर पर ही निर्भर है। भारत में रक्तदान की आवश्यकता पर पूर्व स्वास्थ्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने भी कुछ समय पहले कहा था कि हिंदुस्तान जैसी बड़ी आबादी वाले देश में एक सप्ताह के रक्तदान शिविर से कुछ नहीं होगा। हमें लाखों-करोड़ यूनिट ब्लड डोनेशन की हर रोज आवश्यकता है। दुनिया में ८२ देश ऐसे हैं जहां पर 1००० की आबादी पर महज १० रक्तदाता हैं।
महिलाएं यहां हैं पीछे
आज देश में महिलाएं हर फील्ड में बेहतर काम कर रही हैं लेकिन रक्तदान जैसे महान कार्य में उनका योगदान काफी कम है। डब्ल्यूएचओ की ग्लोबल डाटावेस ऑन ब्लड सेफटी रिपोर्ट के मुताबिक हिंदुस्तान में होने वाले रक्तदान में 100 फीसदी में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ  १० फीसदी है। बाकी ९० फीसदी रक्तदान सिर्फ पुरु ष करते हैं।

कौन कितना करता है रक्तदान
वल्र्ड हैल्थ ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक पूरी दुनिया में ब्लड डोनेड करने वालों में ३० फीसदी महिलाएं हैं। ६ फीसदी रक्तदाता 1८ वर्ष से कम उम्र के हैं।इनमें २७ फीसदी ब्लड डोनर १८- २४ साल की उम्र के बीच के हैं तो ३८ फीसदी रक्तदाताओं की उम्र  २५- ४४ साल के बीच है। ४५-६४ की उम्र में २६ फीसदी रक्तदाता शामिल हैं जबकि ६५ से अधिक उम्र के ३ प्रतिशत रक्तदाता शामिल हैं।

कौन कितना कर रहा रक्तदान
रक्तदान को लेकर अब लोगों में जागरूकता का ही परिणाम है कि दुनिया के ६२ देशों में रक्तदान की पूरी 100 फीसदी जरूरत को स्वैच्छिक रक्तदाताओं से पूरा किया जा रहा है।जबकि २००२ में यह संख्या महज ३९ फीसदी देशों की थी।  ४० देश अपनी २५ फीसदी रक्त की कमी को स्वैच्छिक रक्तदान के माध्यम से पूरा करने में सक्षम हैं अब।
१६१ में से १२० मतलब ७५ फीसदी देशों ने नेशनल ब्लड पॉलिसी बना ली है जबकि २००४ में यह आंकड़े १६२ में से ९८ यानी महज ६० फीसदी थे। ३० देशों ने २००८ में ही नेशनल ब्लड पॉलिसी का निर्माण किया।
भारत की बदली है तस्वीर
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक रक्तदान की तस्वीर जिन देशों में बदली है उनमें हिंदुस्तान भी एक है। पिछले कुछ सालों में बड़ी जागरूकता का ही असर है कि २००७ में ३.६ मिलीयन स्वैच्छिक रक्तदाता भारत में थे जबकि २००८ में ही यह संख्या बढ़कर ४.६ मिलीयन हो गई। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार तेजी से बढ़ी स्वैच्छिक रक्तदाताओं की संख्या वाले देशों में २००७ के २१ फीसदी की तुलना में २००८ में ९४ फीसदी स्वैच्छिक रक्तदाता बढ़े हैं। अफगानिस्तान में १५ फीसदी रक्तदाताओं की जगह २००८ में ८८ फीसदी हो गई है।
ररक्तदान ऐसे भी -
स्वैच्छिक रक्तदान से इतर यदि फैमिली, रिप्लेसमेंट या पेड ब्लड डोनेशन की यदि बात की जाए तो विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक गरीब देशों में यह ३६ प्रतिशत है। सामान्य आर्थिक स्थिति वाले देशों में २७ फीसदी जबकि अमीर देशों में ०.३ फीसदी है।
स्वच्छ रक्तदान भी जरूरी
रक्तदान करना बेहतर है लेकिन वह स्वच्छ और सुरक्षित हो तभी। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्र्ट के मुताबिक दुनिया के ३९ देशों में रक्तदान के पहले किए जाने वाले रक्त परीक्षण ट्रांसमयूशन ट्रांसमिशेवल इंफेक्शन टीटीआईएस की जांच की सुविधा नहीं है।
कहां कितना रक्तदान
रक्तदान की स्थिति पूरी दुनिया में अलग-अलग है।
९१ फीसदी रक्तदान अमीर देशों में, 72 फीसदी रक्तदान सामान्य आर्थिक स्थिति वाले देशों में और गरीब देशों में फीसदी लोग रक्तदान करते हैं।
सेफ ब्लड सेव मदर
इस बार इंटरनेशनल ब्लड डोनेशन डे सेफ ब्लड सेव मदर की थीम पर मनाया जा रहा है। जिसका उद्देश्य पूरी दुनिया में मातृत्व के दौरान होने वाली माताओं की मृत्यु में कमी लाने के लिए जागरूकता लाना है। क्योंकि हर दिन 800 माताएं बच्चे को जन्म देने के दौरान होने वाले कॉमप्लीकेशन के कारण मौत की नींद सो जाती हैं। साथ ही रक्तदान करके लोगों को जिंदगी का तौहफा देेने के लिए धन्यवाद देने और प्रोत्साहित करने के लिए है।
सोशल मीडिया ने बढ़ाई जागरूकता
फेसबुक, ट्वीटर, वॉट्सएप जैसी सोशल नेटर्विर्कंग साइट्स को अक्सर यंगस्टर द्वारा समय खराब करने वाले साधन के तौर पर देखा जाता है, लेकिन यह सोशल प्लेटफार्म लोगों की जिंदगी भी बचा रहा है। ब्ल्ड डोनर अवेयरनेस को लेकर लोकल से लेकर ग्लोबल लेवर पर फेसबुक पेज पर डिफरेंट वॉलेंटियर ग्रुप के माध्यम से यंगस्टर अवेयरनेस फैला रहे हैं। ऐसे में ब्लड बैंक के चक्कर काटने के बजाय एफबी, या वॉट्सएप पर कॉलेज गोइंग यूथ घटना का ब्यौरा दे देते हैं और लिख देते हैं कि किस ब्लड ग्रुप की आवश्यकता है और उसके बाद एफबी पर फैली इस खबर के माध्यम से जल्द ही रिस्पॉन्स मिल जाता है। ऐसे में जान भी आसानी से बच जाती है। इसलिए अब ब्ल्ड डोनेशन ग्रुप सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर पूरा कैंपेन चला रहे हैं। 222.ड्ढद्यशशस्र.ष्श.ह्वद्म के फेसबुक पर मौजूद ब्लड डोनेशन के पेज को अब तक 1 लाख 51 हजार से ज्यादा लाइक मिल चुके हैं, इसी तरह ट्विटर पर भी इस ग्रुप के 8 हजार से ज्यादा फॉलोअर हैं। डेमी एंड कॉपर एडवरटाइजिंग एंड डीसी इंटरएक्टिव ग्रुप द्वारा की गई स्टडी में सामने आया कि सोशल मीडिया पर मौजूद मेडिकल रिलेटेड इन्फॉर्मेशन को 18 से 25 साल के युवा सही मानते हैं, इसलिए ब्लड डोनेशन से युवाओं को जोडऩे के लिए फेसबुक और ट्विटर पर कैंपेनिंग एक बेहतर माध्यम है। फेसबुक पर ब्ल्ड डोनर ग्रुप सोशल ब्लड के फाउंडर कार्तिक नारालशेट्टी के मुताबिक मेरे पड़ोसी एक भारतीय परिवार को रोजाना ब्ल्ड की जरूरत होती थी, क्योंकि उनकी 4 साल की बेटी थैलीसीमिया की मरीज थी। वर्तमान समय में 40 मिलीयन से ज्यादा भारतीय इस बीमारी के मरीज हैं जिन्हें समय-समय पर रक्त की जरूरत होती है। 2011 से अब तक 41हजार 64९ लोगों को अपने इस अभियान का हिस्सा बना चुके कार्तिक के मुताबिक लोग कहानी से प्रेरणा लेते हैं फैक्ट से नहीं। कार्तिक के मुताबिक हर रोज 100 लोग खून की कमी से मर रहे हैं, इसलिए हमें रक्तदान करना चाहिए इसके बजाय मेरे स्कूल में एक बच्चे को ब्लड की जरूरत थी, मैंने ब्लड देकर उसकी जिंदगी बचाई इससे लोग ज्यादा प्रेरित होंगे।
 पहला ब्लड बैंक
ब्लड डोनेशन के बाद ब्ल्ड और ब्ल्ड कंपोनेंट को ब्ल्ड बैंक में सहेजकर रखने की प्रक्रिया होती है। आज ब्लड बैंक दुनिया में जगह-जगह मौजूद हैं लेकिन दुनिया में पहला ब्लड बैंक अमेरिका के न्यूयार्क शहर के माउंट सिनाई हॉस्पिटल में रिचर्ड लेविसन ने स्थापित किया था।
एप खोजेगा ब्ल्ड डोनर
ब्लड डोनेशन के लिए एफबी, ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया के साथ ही अब मोबाइल एप का भी प्रयोग होने लगा है। देश में ब्लड डोनेशन की फील्ड में पिछले 8 साल से काम करने वाले ऑर्गनाइजेशन द्घह्म्द्बद्गठ्ठस्रह्य२ह्यह्
वश्चश्चशह्म्ह्ल.शह्म्द्द ने एक मोबाइल एप लांच किया है। जिसे एंड्रायड, जावा, विंडो और आईओएस प्लेटफार्म पर अपने स्मार्टफोन में लांच किया जा सकता है। इस एप के माध्यम से व्यक्ति देश के किसी भी प्रदेश के किसी शहर में मौजूद डोनर से कॉन्टेक्ट कर सकता है, डोनर के तौर पर रजिस्ट्रेशन करने से लेकर कॉल, एसएमएस की सर्विस भी डोनर के लिए मौजूद है
थैंक्यू अंकल....
थैलेसीमिया पीडि़त एक बच्ची जब टेलीविजन पर आकर थैंक्यू अंकल बोलती है ब्ल्ड डोनेशन के लिए तो वह इमोशनल अपील दिल को छू जाती है। थैलेसीमिया की बीमारी की एड कैंपेन को लेकर बड़े अवेयरनेस के कारण अब लोग आगे बढ़कर ब्लड डोनेशन कर रहे हैं। ऐसें में टीवी पर जब कोई सेलिब्रिटी यह कहती है करके देखिए अच्छा लगता है, तो वह भी कितने ही लोगों को रक्तदान के लिए एक मार्मिक अपील होती है। रक्तदान के प्रति यह जागरूरक और संवेदनशील अभियान ही रक्तदान के लिए प्रेरित कर रहा है।

ग्रुपिंग ने भी किया अपील
एक इंजीनियरिंग स्टूडेंट ने जब अपने हॉस्टल में रहकर साथ पढऩे वाले बैचमेट को ब्लड देकर बचाया तो उसके ग्रुप के कितने ही दोस्त प्रेरित हुए ब्ल्ड डोनेड करने के लिए। यानी की यंगस्टर की यह कॉलेज गैंग भी ब्ल्ड डोनेशन को बढ़ा रही है। लोकल लेवल पर अलग-अलग युवा संगठन से लेकर सामाजिक संगठन भी ब्लड डोनेशन कैंप के माध्यम से लोगों को ब्लड डोनेशन के लिए प्रेरित करते हैं।

Friday, 6 June 2014

अनूठा रिश्ता जो है खास





रक्षाबंधन वह पावन पर्व  है जिसका भाई -बहन के रिश्ते से बड़ा गहरा नाता है। देखने में तो यह रिश्ता �ाी हमसे जुड़े दूसरे रिश्तों की ही तरह है, लेकिन इसमें कुछ तो �ाास है जो इसे उनसे जुदा और अलग बनाता है।

रेशम की कच्ची डोर कितना कुछ कहती है यदि उसके �ाावों को समझने का प्रयास किया जाए। इसमें एक भाई के प्रति बहन का स्नेह दि�ाता है तो बहन के प्रति �ााई के मन में भरा प्यार, कर्तव्य और परवाह के रूप में नजर आता है। बचपन में छोटी-छोटी बातों पर होती है तकरार और फिर शाम तक संग हो जाना।
    वाकई इस रिश्ते की महक हमेशा यूं ही बनी रहे तो कितना अच्छा लगता है। कभी-क�ाी तो लगता है वह बचपन वापस लौट आए । वैसे भी हर राखी पर यूं ही हम पुरानी यादों में खो ही जाते हैं, जो क�ाी आ�ाों में नमी तो कभी चेहरे पर मुस्कान बि�ोर जाती है।

-कितना अलग होता है यह रिश्ता
-हर नाते से जुदा रहता है
-नि: स्वार्थ प्रेम इसमें होता है
-बिना तकरार के अधूरा सा लगता है
-क�ाी गुस्सा  क�ाी शरारत तो कभी प्यार
-कभी सारी दुनिया इस रिश्ते में सिमटी लगती है
-कितना अजीब होता है  यह रिश्ता
-यह कहलाता है भाई - बहन का रिश्ता      

                                                      सर्जना चतुर्वेदी
                                                        

Tuesday, 27 May 2014


लगन से पायी तृप्ति ने सफलता


हायर सेकेंडरी परीक्षा में सतना की तृप्ति अव्वल
हर दर्द के पीछे छिपी होती हैं खुशियां

जिंदगी में यदि दर्द मिला है तो दवा भी मिलेगी... लेकिन ए इंसा तू कभी हारना मत... इन लाइनों में छिपी है प्रदेश की बिटिया तृप्ति त्रिपाठी की लिखी सफलता की इबारत। कहते हैं कि यदि हमारे साथ कुछ बुरा हो तो हमें उसके पीछे छिपी अच्छाई को देखने की कोशिश करनी चाहिए और बिना थके सिर्फ अपने लक्ष्य को पाने का प्रयास करना चाहिए। इस बात को मूल मंत्र मानकर प्रदेश के टॉप टेन में जगह बनाने का सपना पलकों पर संजोकर चलने वाली तृप्ति ने माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा आयोजित 12वीं की बोर्ड परीक्षा में  पूरे प्रदेश में शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। सरस्वती शिशु मंदिर सतना की छात्रा तृप्ति ने 500 में से 488 अंक लाकर ९७.6 फीसदी अंक के साथ  सफलता प्राप्त की है। तृप्ति ने इससे पहले 10वीं की बोर्ड परीक्षा में भी ९३ फीसदी अंकों के साथ परीक्षा में सफलता प्राप्त की थी। प्रदेश की इस युवा प्रतिभा ने अपनी सफलता और भविष्य के सपनों को रोजगार और निर्माण से साझा किया।
माध्यमिक शिक्षा मंडल की हायर सेकेंडरी की परीक्षा में आर्ट संकाय में प्रथम आने पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं
धन्यवाद।
यह तो तय था टॉप टेन में रहूंगी
यदि कोई ख्वाव देखो तो उसे पूरा करने के लिए तय रणनीति के साथ काम करना होता है। तृप्ति ने भी यही किया। तृप्ति ने बताया कि 11वीं की परीक्षा का परिणाम आने के बाद मैंने यह तय कर लिया था, कि मुझे प्रदेश की प्रावीण्य सूची में अपनी जगह बनानी है। उस दिन से ही मैंने अपनी पढ़ाई पर फोकस कर लिया था। तृप्ति कहती हैं कि घटों में पढ़ाई करने के बजाय टॉपिक के आधार पर योजना बनाकर अपनी पढ़ाई की। इस दौरान मुझे मेरे स्कूल के शिक्षकों का भी पूरा सहयोग मिला, जैसे कि यदि मैँ फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स को घर में ज्यादा देर पढऩे के कारण हिंदी अंग्रेजी को पूरा समय नहीं  दे पाती थी, तो मेरे टीचर्स ने मुझे किसी भी सेक्शन में जाकर क्लास अटैंड करने की परमीशन दे रखी थी, जिससे में आसानी से सुविधा अनुसार पढ़ाई कर सकती थी।
अपनों के साथ के बिना नहीं हो सकता था मुमकिन
तृप्ति कहती हैं कि प्रदेश में अव्वल आने के पीछे मेरी मेहनत के साथ-साथ मेरे परिवार, दोस्तों और स्कूल के टीचर्स का भी पूरा सहयोग मुझे मिला। भले ही मेरे माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्य पढ़ाई में मेरी मदद नहीं कर सकते थे, लेकिन आर्थिक अभाव के बावजूद मुझे कोई कमी  महसूस नहीं होने दी और हर कदम पर मेरा मोरल सपोर्ट किया। तृप्ति कहती हैं कि अक्सर परिवार और समाज के लोग यह कहते हैं कि लड़की बड़ी हो गई है खाना बनाना सिखाओ घर के काम सिखाओ और यह बातें मैंने भी सुनी लेकिन मेरे परिवार के साथ के कारण ही इन बातों को इग्नोर करते हुए मैंने अपनी पढ़ाई की। तृप्ति कहती हैं कि पढ़ाई के कारण घर का कोई काम नहीं करती थी क्योंकि मुझे पूरा सहयोग अपने परिवार का मिला।

आलोचना को चुनौती के रूप में लिया
हमेशाा सबकुछ अच्छा होता रहे यह संभव नहीं होता लेकिन बुराई के पीछे भी कुछ अच्छाई छिपी होती है। तृप्ति बताती है कि मेरी कोचिंग घर से काफी दूर थी, इसलिए पैदल आने-जाने के कारण थकान की वजह से फिजिकल पैन बना रहता था। साथ ही ब्लड की कमी की वजह से कमजोर रहती थी, जिससे अक्सर लोग यह कहा करते थे कि तुम तो साल भर बीमार रहती हो पढ़ाई कैसे करोगी। तृप्ति कहती है कि शायद यह तकलीफ और आलोचना नहीं मिलती तो मैं भी कुछ खास नहीं कर पाती। इन बातों ने ही मुझे मेरे लक्ष्य के प्रति और दृढ़ बनाया, इसलिए मुझे लगता है कि जो भी होता है
अच्छे के लिए होता है।

सिविल सर्विस ही है मेरी मंजिल
तृप्ति ने अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में बताया कि मैं शुरू से ही सिविल सर्विस में जाना चाहती हूं क्योंकि यह एक ऐसी सर्विस है, जिसमें आप सीधे तौर पर लोगों की बेहतरी के लिए काम कर सकते हो। इसलिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई बिट्स पिलानी से पूरी करने के बाद सिविल सर्विस में जाने की इच्छा रखती हैं। प्रदेश की यह हौनहार बिटिया आर्थिक अभाव के चलते प्रदेश सरकार से भी यथासंभव सहयोग की अपेक्षा रखती है।
ईश्वर लेता है परीक्षा
निजी ट्रांसपोर्ट फर्म में काम करने वाले तृप्ति के पिता योगेन्द्र त्रिपाठी समेत तृप्ति का पूरा परिवार अपनी बेटी की इस सफलता से काफी खुश है। तृप्ति कहती है कि कई बार जब निराशा होती थी, या कुछ अच्छा नहीं लगता था तो अपनों से बातें साझा करती थी, जिससे मुझे संबल मिलता था। तृप्ति कहती है कि घर में अक्सर लोग कहा करते थे कि ईश्वर तुमहारी परीक्षा ले रहा है और तुमहें उसमें पास होना है।
टॉपर टिप्स
तृप्ति कहती है कि मैंने आन्सर शीट में हर सवाल का जवाब हैडिंग बनाकर फिर उसे विस्तार से लिखने का प्रयास किया। हिंदी और इंग्लिश के पेपर में अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए प्रसिद्ध कोटेशन का प्रयोग किया। तृप्ति कहती हैं कि किताबी भाषा लिखने के बजाय हर उत्तर को हमें अपने शब्दों में लिखना चाहिए। तृप्ति ने बताया कि स्कूल के दिनों में उन्होंने 6 से 7 घंटे पढ़ाई की और स्कूल की छुट््िटयां शुरू होते ही यह 15 से सोलह घंटे तक की।
पेपर लेट नहीं होता तो शायद इतना रिवीजन नहीं होता
12वीं का पेपर लीक होने की वजह से डिले होने के कारण तृप्ति कहती है कि पहले तो काफी गुस्सा आया था लेकिन इसका भी एक फायदा यह हुआ कि मैं ज्यादा बेहतर ढंग से रिवीजन कर सकी।
मुश्किलों से ना घबराएं
तृप्ति युवाओं को संदेश देते हुए कहती हैं कि कभी भी मुश्किलों के सामने हार नहीं आना चाहिए
और अपनी तरफ से हर काम को पूरी ईमानदारी और आत्मविश्वास के साथ किया जाए तो हर मुकाम को हासिल किया जा सकता है।
प्रस्तुृति सर्जना चतुर्वेदी

Saturday, 24 May 2014

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।

जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।

आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए।

प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।

मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।

जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसु तेरी पलकों से उठाया जाए।

गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी
ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए।

Friday, 23 May 2014

हर दर्द के पीछे छिपी होती हैं खुशियां

 ROJGAR AUR NIRMAN 26 MAY 2014

लगन से पायी तृप्ति ने सफलता
हायर सेकेंडरी परीक्षा में सतना की तृप्ति अव्वल
हर दर्द के पीछे छिपी होती हैं खुशियां

जिंदगी में यदि दर्द मिला है तो दवा भी मिलेगी... लेकिन ए इंसा तू कभी हारना मत... इन लाइनों में छिपी है प्रदेश की बिटिया तृप्ति त्रिपाठी की लिखी सफलता की इबारत। कहते हैं कि यदि हमारे साथ कुछ बुरा हो तो हमें उसके पीछे छिपी अच्छाई को देखने की कोशिश करनी चाहिए और बिना थके सिर्फ अपने लक्ष्य को पाने का प्रयास करना चाहिए। इस बात को मूल मंत्र मानकर प्रदेश के टॉप टेन में जगह बनाने का सपना पलकों पर संजोकर चलने वाली तृप्ति ने माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा आयोजित 12वीं की बोर्ड परीक्षा में  पूरे प्रदेश में शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। सरस्वती शिशु मंदिर सतना की छात्रा तृप्ति ने 500 में से 488 अंक लाकर ९७.6 फीसदी अंक के साथ  सफलता प्राप्त की है। तृप्ति ने इससे पहले 10वीं की बोर्ड परीक्षा में भी ९३ फीसदी अंकों के साथ परीक्षा में सफलता प्राप्त की थी। प्रदेश की इस युवा प्रतिभा ने अपनी सफलता और भविष्य के सपनों को रोजगार और निर्माण से साझा किया।
माध्यमिक शिक्षा मंडल की हायर सेकेंडरी की परीक्षा में आर्ट संकाय में प्रथम आने पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं
धन्यवाद।
यह तो तय था टॉप टेन में रहूंगी
यदि कोई ख्वाव देखो तो उसे पूरा करने के लिए तय रणनीति के साथ काम करना होता है। तृप्ति ने भी यही किया। तृप्ति ने बताया कि 11वीं की परीक्षा का परिणाम आने के बाद मैंने यह तय कर लिया था, कि मुझे प्रदेश की प्रावीण्य सूची में अपनी जगह बनानी है। उस दिन से ही मैंने अपनी पढ़ाई पर फोकस कर लिया था। तृप्ति कहती हैं कि घटों में पढ़ाई करने के बजाय टॉपिक के आधार पर योजना बनाकर अपनी पढ़ाई की। इस दौरान मुझे मेरे स्कूल के शिक्षकों का भी पूरा सहयोग मिला, जैसे कि यदि मैँ फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स को घर में ज्यादा देर पढऩे के कारण हिंदी अंग्रेजी को पूरा समय नहीं  दे पाती थी, तो मेरे टीचर्स ने मुझे किसी भी सेक्शन में जाकर क्लास अटैंड करने की परमीशन दे रखी थी, जिससे में आसानी से सुविधा अनुसार पढ़ाई कर सकती थी।
अपनों के साथ के बिना नहीं हो सकता था मुमकिन
तृप्ति कहती हैं कि प्रदेश में अव्वल आने के पीछे मेरी मेहनत के साथ-साथ मेरे परिवार, दोस्तों और स्कूल के टीचर्स का भी पूरा सहयोग मुझे मिला। भले ही मेरे माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्य पढ़ाई में मेरी मदद नहीं कर सकते थे, लेकिन आर्थिक अभाव के बावजूद मुझे कोई कमी  महसूस नहीं होने दी और हर कदम पर मेरा मोरल सपोर्ट किया। तृप्ति कहती हैं कि अक्सर परिवार और समाज के लोग यह कहते हैं कि लड़की बड़ी हो गई है खाना बनाना सिखाओ घर के काम सिखाओ और यह बातें मैंने भी सुनी लेकिन मेरे परिवार के साथ के कारण ही इन बातों को इग्नोर करते हुए मैंने अपनी पढ़ाई की। तृप्ति कहती हैं कि पढ़ाई के कारण घर का कोई काम नहीं करती थी क्योंकि मुझे पूरा सहयोग अपने परिवार का मिला।

आलोचना को चुनौती के रूप में लिया
हमेशाा सबकुछ अच्छा होता रहे यह संभव नहीं होता लेकिन बुराई के पीछे भी कुछ अच्छाई छिपी होती है। तृप्ति बताती है कि मेरी कोचिंग घर से काफी दूर थी, इसलिए पैदल आने-जाने के कारण थकान की वजह से फिजिकल पैन बना रहता था। साथ ही ब्लड की कमी की वजह से कमजोर रहती थी, जिससे अक्सर लोग यह कहा करते थे कि तुम तो साल भर बीमार रहती हो पढ़ाई कैसे करोगी। तृप्ति कहती है कि शायद यह तकलीफ और आलोचना नहीं मिलती तो मैं भी कुछ खास नहीं कर पाती। इन बातों ने ही मुझे मेरे लक्ष्य के प्रति और दृढ़ बनाया, इसलिए मुझे लगता है कि जो भी होता है
अच्छे के लिए होता है।

सिविल सर्विस ही है मेरी मंजिल
तृप्ति ने अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में बताया कि मैं शुरू से ही सिविल सर्विस में जाना चाहती हूं क्योंकि यह एक ऐसी सर्विस है, जिसमें आप सीधे तौर पर लोगों की बेहतरी के लिए काम कर सकते हो। इसलिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई बिट्स पिलानी से पूरी करने के बाद सिविल सर्विस में जाने की इच्छा रखती हैं। प्रदेश की यह हौनहार बिटिया आर्थिक अभाव के चलते प्रदेश सरकार से भी यथासंभव सहयोग की अपेक्षा रखती है।
ईश्वर लेता है परीक्षा
निजी ट्रांसपोर्ट फर्म में काम करने वाले तृप्ति के पिता योगेन्द्र त्रिपाठी समेत तृप्ति का पूरा परिवार अपनी बेटी की इस सफलता से काफी खुश है। तृप्ति कहती है कि कई बार जब निराशा होती थी, या कुछ अच्छा नहीं लगता था तो अपनों से बातें साझा करती थी, जिससे मुझे संबल मिलता था। तृप्ति कहती है कि घर में अक्सर लोग कहा करते थे कि ईश्वर तुमहारी परीक्षा ले रहा है और तुमहें उसमें पास होना है।
टॉपर टिप्स
तृप्ति कहती है कि मैंने आन्सर शीट में हर सवाल का जवाब हैडिंग बनाकर फिर उसे विस्तार से लिखने का प्रयास किया। हिंदी और इंग्लिश के पेपर में अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए प्रसिद्ध कोटेशन का प्रयोग किया। तृप्ति कहती हैं कि किताबी भाषा लिखने के बजाय हर उत्तर को हमें अपने शब्दों में लिखना चाहिए। तृप्ति ने बताया कि स्कूल के दिनों में उन्होंने 6 से 7 घंटे पढ़ाई की और स्कूल की छुट््िटयां शुरू होते ही यह 15 से सोलह घंटे तक की।
पेपर लेट नहीं होता तो शायद इतना रिवीजन नहीं होता
12वीं का पेपर लीक होने की वजह से डिले होने के कारण तृप्ति कहती है कि पहले तो काफी गुस्सा आया था लेकिन इसका भी एक फायदा यह हुआ कि मैं ज्यादा बेहतर ढंग से रिवीजन कर सकी।
मुश्किलों से ना घबराएं
तृप्ति युवाओं को संदेश देते हुए कहती हैं कि कभी भी मुश्किलों के सामने हार नहीं आना चाहिए
और अपनी तरफ से हर काम को पूरी ईमानदारी और आत्मविश्वास के साथ किया जाए तो हर मुकाम को हासिल किया जा सकता है।
प्रस्तुृति सर्जना चतुर्वेदी