SARJANA CHATURVEDI

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Wednesday, 16 July 2014

मां के आंचल में समाए कितने ही बेसहारा


          ममत्व की मिसाल - मदर टेरेसा

पीडि़त मानवता की सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा है, स्वामी विवेकानंद के इस विचार को सुना भले ही करोड़ों लोगों ने होगा लेकिन इसे जीवन में उतारने वाले चंद लोग ही हैं। ऐसा ही एक नाम है मदर टेरेसा, मदर यानी मां जिन्होंने हिंदुस्तान की धरती पर रहने वाले गरीब और असहाय लोगों के लिए अपना आंचल फैलाकर अपनी ममता के आगोश में उन्हें रखा। इसलिए कहा भी जाता है जन्म देने वाले से बड़ा पालन पोषण करने वाला करने वाला होता है। अपनी कोख से भले किसी बच्चे को जन्म न देने वाली इस मां की मानवता की सेवा को देखकर उनकी वंदना लोग करते हैं। ममत्व और प्रेम की प्रतिमूर्ति मदर टेरेसा ने दुनिया भर में अपने शांति-कार्यों की वजह से नाम कमाया. मदर टेरेसा ने जिस आत्मीयता से भारत के दीन-दुखियों की सेवा की है, उसके लिए देश सदैव उनके प्रति कृतज्ञ रहेगा।  मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को मेसिडोनिया की राजधानी स्कोप्जे शहर में हुआ था लेकिन वह खुद अपना जन्मदिन 27 अगस्त मानती थीं। उनके पिता का नाम निकोला बोयाजू और माता का नाम द्राना बोयाजू था। मदर टेरेसा का असली नाम 'अगनेस गोंझा बोयाजिजूÓ था। अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है।  अगनेस के सिर से पिता का साया महज 7 बरस की आयु में ही उठ गया बाद में उनका लालन-पालन उनकी माता ने किया। पांच भाई-बहनों में वह सबसे छोटी थीं और उनके जन्म के समय उनकी बड़ी बहन आच्च की उम्र 7 साल और भाई की उम्र 2 साल थी,अपने स्कूली जीवन में ही 'सोडालिटीÓ से उनका सम्पर्क हुआ। वह इस संस्था की सदस्या बन गयीं। यहीं से उनके जीवन को एक नयी दिशा मिली; उनके विचारों को चिन्तन का एक नया आयाम मिला। अन्तत: इस नयी दिशा ने, इस नये चिन्तन ने ममता की मूर्ति माँ टेरेसा का निर्माण किया। घर में सभी प्रकार का सुख था। अभाव या दु:ख जैसी कोई चीज़ न थी, किन्तु अग्नेस को तो मां बनना था, अनेक निराश्रितों, दु:खियों उपेक्षितों की मां, विश्व की मां, विश्वजननी बनना था। उनकी कितनी ही सन्तानें नया जीवन पाकर सुखों का भोग कर रही हैं, कितनी ही सन्तानें उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुकी हैं, भारत में ही नहीं विदेशों में भी।
जिनके जन्म देनेवालों का कोई पता तक नहीं, ऐसे कितने ही व्यक्ति मां की ममता का सम्बल पाकर नये जीवन में प्रवेश कर चुके हैं कितनी ही अबलाएं अपनी गृहस्थी बसा चुकी हैं।
कितने ही परित्यक्त शिशु माँ की ममता पाकर शैशव का सुख भोग रहे हैं, किलकारियां मार रहे हैं।
कितने ही विकलांग, मूक-बधिर माँ के शिशु-सदनों में सामान्य जीवन जी रहे हैं।  गोंझा को एक नया नाम 'सिस्टर टेरेसाÓ दिया गया जो इस बात का संकेत था कि वह एक नया जीवन शुरू करने जा रही हैं। यह नया जीवन एक नए देश में जोकि उनके परिवार से काफी दूर था, सहज नहीं था लेकिन सिस्टर टेरेसा ने बड़ी शांति का अनुभव किया।सिस्टर टेरेसा तीन अन्य सिस्टरों के साथ आयरलैंड से एक जहाज में बैठकर 6 जनवरी, 1929 को कोलकाता में 'लोरेटो कॉन्वेंटÓ पंहुचीं. वह बहुत ही अच्छी अनुशासित शिक्षिका थीं और विद्यार्थी उन्हें बहुत प्यार करते थे।  वर्ष 1944 में वह सेंट मैरी स्कूल की प्रिंसिपल बन गईं। मदर टेरेसा ने आवश्यक नर्सिग ट्रेनिंग पूरी की और 1948 में वापस कोलकाता आ गईं और वहां से पहली बार तालतला गई, जहां वह गरीब बुजुर्गो की देखभाल करने वाली संस्था के साथ रहीं। मदर टेरेसा जब भारत आईं तो उन्होंने यहां बेसहारा और विकलांग बच्चों तथा सड़क के किनारे पड़े असहाय रोगियों की दयनीय स्थिति को अपनी आंखों से देखा और फिर वे भारत से मुंह मोडऩे का साहस नहीं कर सकीं। वे यहीं पर रुक गईं और जनसेवा का व्रत ले लिया, जिसका वे अनवरत पालन करती रहीं। मदर टेरेसा ने भ्रूण हत्या के विरोध में सारे विश्व में अपना रोष दर्शाते हुए अनाथ एवं अवैध संतानों को अपनाकर मातृत्व-सुख प्रदान किया। उन्होंने फुटपाथों पर पड़े हुए रोत-सिसकते रोगी अथवा मरणासन्न असहाय व्यक्तियों को उठाया और अपने सेवा केन्द्रों में उनका उपचार कर स्वस्थ बनाया, या कम से कम उनके अन्तिम समय को शान्तिपूर्ण बना दिया। दुखी मानवता की सेवा ही उनके जीवन का व्रत था। सन् 1949 में मदर टेरेसा ने गरीब, असहाय व अस्वस्थ लोगों की मदद के लिए 'मिशनरीज ऑफ चैरिटीÓ की स्थापना की, जिसे 7 अक्टूबर, 1950 को रोमन कैथोलिक चर्च ने मान्यता दी.  इसी के साथ ही उन्होंने पारंपरिक वस्त्रों को त्यागकर नीली किनारी वाली साड़ी पहनने का फैसला किया। मदर टेरेसा ने 'निर्मल हृदयÓ और 'निर्मला शिशु भवनÓ के नाम से आश्रम खोले, जिनमें वे असाध्य बीमारी से पीडि़त रोगियों व गरीबों की  अस्वयं सेवा करती थीं। जिन्हें
समाज ने बाहर निकाल दिया हो, ऐसे लोगों पर इस महिला ने अपनी ममता व प्रेम लुटाकर सेवा भावना का परिचय दिया।
साल 1962 में भारत सरकार ने उनकी समाज सेवा और जन कल्याण की भावना की कद्र करते हुए उन्हें पद्म श्री से नवाजा। 1980 में मदर टेरेसा को उनके द्वारा किये गये कार्यों के कारण भारत सरकार ने भारत रत्‍न से अलंकृत किया। विश्व भर में फैले उनके मिशनरी के कार्यों की वजह से मदर टेरेसा को 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला। उन्हें यह पुरस्कार गरीबों और असहायों की सहायता करने के लिए दिया गया था, उन्होंने नोबेल पुरस्कार की 192,000 डॉलर की धन-राशि को भारतीय गरीबों के लिए एक फंड के तौर पर इस्तेमाल करने का निर्णय लिया जो उनके विशाल हृदय को दर्शाता है। १९८५ में उन्हें मेडल आफ फ्रीडम दिया गया। पीडि़त मानवता की सेवा के लिए उन्हें संपूर्ण विश्व में अलग -अलग सम्मानों से सम्मानित किया गया। मदर टेरेसा के सम्मान में भारत सरकार द्वारा डाक टिकट भी जारी किया जा चुका है।


अपने जीवन के अंतिम समय में मदर टेरेसा पर कई तरह के आरोप भी लगे. उन पर गरीबों की सेवा करने के बदले उनका धर्म बदलवाकर ईसाई बनाने का आरोप लगा। भारत में भी प. बंगाल और कोलकाता जैसे राज्यों में उनकी निंदा हुई. मानवता की रखवाली की आड़ में उन्हें ईसाई धर्म का प्रचारक माना जाता था. लेकिन कहते हैं ना जहां सफलता होती है वहां आलोचना तो होती ही है.्रवर्ष 1983 में 73 वर्ष की आयु में मदर टेरेसा रोम में पॉप जॉन पॉल द्वितीय से मिलने के लिए गईं।. वही उन्हें पहला हार्ट अटैक आ गया। इसके बाद साल 1989 में उन्हें दूसरा हृदयाघात आया। लगातार गिरती सेहत की वजह से 5 सितम्बर, 1997 को उनकी मौत हो गई। उनकी मौत के समय तक 'मिशनरीज ऑफ चैरिटीÓ में 4000 सिस्टर और 300 अन्य सहयोगी संस्थाएं काम कर रही थीं जो विश्व के 123 देशों में समाज सेवा में लिप्त थीं। समाज सेवा और गरीबों की देखभाल करने के लिए जो आत्मसमर्पण मदर टेरेसा ने दिखाया उसे देखते हुए पोप जॉन पाल द्वितीय ने 19 अक्टूबर, 2003 को रोम में मदर टेरेसा को धन्य घोषित किया था।

मदर टेरेसा भले ही जन्म से भारतीय न हों मगर वह भारत में जन्में किसी अन्य भारतीय से ज्यादा भारत मां की सच्ची संतान हैं। इस प्रसंग में हमें महाभारत के अप्रतिम महारथी कर्ण का स्मरण हो आता है। बेचारा कर्ण, अविवाहित मां की सन्तान कर्ण, जिसे लोकलाज के भय से मां नदी की गोद में विसर्जित कर देती है। संयोग से वह  शूद्र को मिल जाता है। सन्तानहीन शूद्र ही उसका पालन-पोषण करता है। हीरा तो हीरा ही रहता है, चाहे वह जौहरी के पास रहे अथवा धूल में पड़ा हो। वह स्वयं कह देता है कि वह हीरा है।परिस्थितियां कर्ण का साथ देती हैं, दुर्योधन उसे राजा बना देता है, यह बाद की बात है, किन्तु रूढिय़ों में जकड़ा भारतीय उसकी योग्यता को न देख कर उसके कुल, गोत्र आदि को देखता है। उसे राजकुमारों के साथ किसी भी प्रतियोगिता में भाग लेने के सर्वथा अयोग्य समझा जाता है। तब कर्ण कह उठता है-''मैं शूद्र हूं, शूद्रपुत्र हूं या जो कोई भी हूं, इसमें मेरा क्या दोष ? किसी भी कुल में जन्म लेना दैवाधीन है, जबकि पौरुष का परिचय देना मेरे अपने वश में हैं।ÓÓकर्ण कहता है कि किसी भी खानदान में जन्म लेना मेरे वश में नहीं है। हां, वीरता का परिचय देना मेरे वश में है। नीच कुल में जन्म लेना मेरी अयोग्यता का परिचायक कैसे हो सकता है, क्योंकि यह मेरे वश में नहीं है, जो मेरे वश में है, उसकी बात करो। मां टेरेसा का कथन था, ''मेरा जन्म भारत में नहीं हुआ, किन्तु मैं स्वयं भारतीय बन गयी हूं।Óइन दोनों में किसे महान कहा जाएगा, निश्चय ही जो अपने कर्मों से भारतीय बना हो।
परम्परागत रूप में सम्पन्नता प्राप्त होने पर यदि कोई उन्नति कर भी ले, तो इसमें उसे अधिक श्रेय नहीं दिया जा सकता, किन्तु जो स्वयं अपने बलबूते पर उन्नति करे, वह निश्चय ही महान है।यदि हम धार्मिक दुराग्रहों से मुक्त होकर विचार करें, तो कर्ण सभी पाण्डवों से कहीं अधिक महान प्रतीत होता है। मां टेरेसा तो सभी जन्मजात भारतीयों से महान थीं ही। इसे भी एक विचित्र संयोग ही कहा जाएगा कि मां टेरेसा कितने ही मातृ-परित्यक्त कर्णों की मां थीं। उनके ममतामय हाथों का; उनके वात्सल्य का सम्बल प्राप्त कर कितने ही कर्णों को एक नया जीवन मिला।



प्रस्तुति सर्जना चतुर्वेदी

shakshiyat nelson mandela


Saturday, 14 June 2014

करके देखिए अच्छा लगता है.

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अंतर्राष्ट्रीय रक्तदान दिवस 14 जून
आज का युवा जागरूक है और उसकी जागरूकता और जोश को अब हम हर पल महसूस कर सकते हैं। हाल ही में भारत में हुए इलेक्शन में भी देश की इस युवा आबादी ने अपने वोट की कीमत समझते हुए सरकार को चुना है और इसके पीछे सबसे बड़ी ताकत है अवेयरनेस की। जिसका असर अब हर क्षेत्र में देखने को मिलने लगा है। अक्सर खून के रिश्तों को एक परिवार से जोड़कर देखा जाता है लेकिन यह रिश्ता उन लोगों के बीच भी बन जाता है। जब एक ने खून देकर दूसरे को जिंदगी दी हो, और यह रिश्ता ना ही जन्म से जुड़ा होता है, न मजहब से और न किसी स्वार्थ से लेकिन जिंदगी को देने वाला वह अनजाना जरूरतमंद परिवार के लिए अपना बन जाता है। यह रिश्ता जुड़ता है खून से, यह रिश्ता जुड़ता है रक्त दान से। ब्लड डोनेशन या रक्तदान के बारे में जानते तो हम सभी हैं लेकिन इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने में सोशल मीडिया जनरेशन ने महती भूमिका निभाई है, आज किसी को ब्लड की जरूरत होती है, तो वॉट््सएप, फेसबुक जैसी सोशल साइट्स के माध्यम से दोस्तों के बीच यह मैसेज दे देते हैं और जरूरतमंद की जान भी बच जाती है। यह है सोशल मीडिया की ताकत।
विश्व रक्तदान दिवस हर साल 14 जून को मनाया जाता है। ब्लड ग्रुप सिस्टम की खोज करने वाले कार्ल लेंसियर के जन्मदिन की खुशी में यह दिन हर साल सेलिब्रेट किया जाता है।
अभी भी है दरकार
१९९७ में वल्र्ड हैल्थ ऑर्गनाइजेशन ने विकसित देशों के लिए स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए एक लक्ष्य निर्धारित किया था। १२४ में से महज ४९ देश उस लक्ष्य को सर्वे के अनुसार पूरा कर पाए थे। अस्पतालों में हर दिन रक्तदान की जरूरत होती है। एक साल में 8० मिलीयन यूनिट ब्लड डोनर और पेड डोनर के द्वारा किया जाता है। जो जरूरत की तुलना में काफी कम है। विकासशील देशों में यह स्थिति और भी चिंताजनक है। क्योंकि वहां महज ३८ फीसदी रक्तदान होता है जबकि दुनिया की ८२ फीसदी आबादी वहां निवास करती है, जो रक्तदान की कमी के कारण अधिकांशत: पेड डोनर पर ही निर्भर है। भारत में रक्तदान की आवश्यकता पर पूर्व स्वास्थ्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने भी कुछ समय पहले कहा था कि हिंदुस्तान जैसी बड़ी आबादी वाले देश में एक सप्ताह के रक्तदान शिविर से कुछ नहीं होगा। हमें लाखों-करोड़ यूनिट ब्लड डोनेशन की हर रोज आवश्यकता है। दुनिया में ८२ देश ऐसे हैं जहां पर 1००० की आबादी पर महज १० रक्तदाता हैं।
महिलाएं यहां हैं पीछे
आज देश में महिलाएं हर फील्ड में बेहतर काम कर रही हैं लेकिन रक्तदान जैसे महान कार्य में उनका योगदान काफी कम है। डब्ल्यूएचओ की ग्लोबल डाटावेस ऑन ब्लड सेफटी रिपोर्ट के मुताबिक हिंदुस्तान में होने वाले रक्तदान में 100 फीसदी में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ  १० फीसदी है। बाकी ९० फीसदी रक्तदान सिर्फ पुरु ष करते हैं।

कौन कितना करता है रक्तदान
वल्र्ड हैल्थ ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक पूरी दुनिया में ब्लड डोनेड करने वालों में ३० फीसदी महिलाएं हैं। ६ फीसदी रक्तदाता 1८ वर्ष से कम उम्र के हैं।इनमें २७ फीसदी ब्लड डोनर १८- २४ साल की उम्र के बीच के हैं तो ३८ फीसदी रक्तदाताओं की उम्र  २५- ४४ साल के बीच है। ४५-६४ की उम्र में २६ फीसदी रक्तदाता शामिल हैं जबकि ६५ से अधिक उम्र के ३ प्रतिशत रक्तदाता शामिल हैं।

कौन कितना कर रहा रक्तदान
रक्तदान को लेकर अब लोगों में जागरूकता का ही परिणाम है कि दुनिया के ६२ देशों में रक्तदान की पूरी 100 फीसदी जरूरत को स्वैच्छिक रक्तदाताओं से पूरा किया जा रहा है।जबकि २००२ में यह संख्या महज ३९ फीसदी देशों की थी।  ४० देश अपनी २५ फीसदी रक्त की कमी को स्वैच्छिक रक्तदान के माध्यम से पूरा करने में सक्षम हैं अब।
१६१ में से १२० मतलब ७५ फीसदी देशों ने नेशनल ब्लड पॉलिसी बना ली है जबकि २००४ में यह आंकड़े १६२ में से ९८ यानी महज ६० फीसदी थे। ३० देशों ने २००८ में ही नेशनल ब्लड पॉलिसी का निर्माण किया।
भारत की बदली है तस्वीर
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक रक्तदान की तस्वीर जिन देशों में बदली है उनमें हिंदुस्तान भी एक है। पिछले कुछ सालों में बड़ी जागरूकता का ही असर है कि २००७ में ३.६ मिलीयन स्वैच्छिक रक्तदाता भारत में थे जबकि २००८ में ही यह संख्या बढ़कर ४.६ मिलीयन हो गई। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार तेजी से बढ़ी स्वैच्छिक रक्तदाताओं की संख्या वाले देशों में २००७ के २१ फीसदी की तुलना में २००८ में ९४ फीसदी स्वैच्छिक रक्तदाता बढ़े हैं। अफगानिस्तान में १५ फीसदी रक्तदाताओं की जगह २००८ में ८८ फीसदी हो गई है।
ररक्तदान ऐसे भी -
स्वैच्छिक रक्तदान से इतर यदि फैमिली, रिप्लेसमेंट या पेड ब्लड डोनेशन की यदि बात की जाए तो विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक गरीब देशों में यह ३६ प्रतिशत है। सामान्य आर्थिक स्थिति वाले देशों में २७ फीसदी जबकि अमीर देशों में ०.३ फीसदी है।
स्वच्छ रक्तदान भी जरूरी
रक्तदान करना बेहतर है लेकिन वह स्वच्छ और सुरक्षित हो तभी। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्र्ट के मुताबिक दुनिया के ३९ देशों में रक्तदान के पहले किए जाने वाले रक्त परीक्षण ट्रांसमयूशन ट्रांसमिशेवल इंफेक्शन टीटीआईएस की जांच की सुविधा नहीं है।
कहां कितना रक्तदान
रक्तदान की स्थिति पूरी दुनिया में अलग-अलग है।
९१ फीसदी रक्तदान अमीर देशों में, 72 फीसदी रक्तदान सामान्य आर्थिक स्थिति वाले देशों में और गरीब देशों में फीसदी लोग रक्तदान करते हैं।
सेफ ब्लड सेव मदर
इस बार इंटरनेशनल ब्लड डोनेशन डे सेफ ब्लड सेव मदर की थीम पर मनाया जा रहा है। जिसका उद्देश्य पूरी दुनिया में मातृत्व के दौरान होने वाली माताओं की मृत्यु में कमी लाने के लिए जागरूकता लाना है। क्योंकि हर दिन 800 माताएं बच्चे को जन्म देने के दौरान होने वाले कॉमप्लीकेशन के कारण मौत की नींद सो जाती हैं। साथ ही रक्तदान करके लोगों को जिंदगी का तौहफा देेने के लिए धन्यवाद देने और प्रोत्साहित करने के लिए है।
सोशल मीडिया ने बढ़ाई जागरूकता
फेसबुक, ट्वीटर, वॉट्सएप जैसी सोशल नेटर्विर्कंग साइट्स को अक्सर यंगस्टर द्वारा समय खराब करने वाले साधन के तौर पर देखा जाता है, लेकिन यह सोशल प्लेटफार्म लोगों की जिंदगी भी बचा रहा है। ब्ल्ड डोनर अवेयरनेस को लेकर लोकल से लेकर ग्लोबल लेवर पर फेसबुक पेज पर डिफरेंट वॉलेंटियर ग्रुप के माध्यम से यंगस्टर अवेयरनेस फैला रहे हैं। ऐसे में ब्लड बैंक के चक्कर काटने के बजाय एफबी, या वॉट्सएप पर कॉलेज गोइंग यूथ घटना का ब्यौरा दे देते हैं और लिख देते हैं कि किस ब्लड ग्रुप की आवश्यकता है और उसके बाद एफबी पर फैली इस खबर के माध्यम से जल्द ही रिस्पॉन्स मिल जाता है। ऐसे में जान भी आसानी से बच जाती है। इसलिए अब ब्ल्ड डोनेशन ग्रुप सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर पूरा कैंपेन चला रहे हैं। 222.ड्ढद्यशशस्र.ष्श.ह्वद्म के फेसबुक पर मौजूद ब्लड डोनेशन के पेज को अब तक 1 लाख 51 हजार से ज्यादा लाइक मिल चुके हैं, इसी तरह ट्विटर पर भी इस ग्रुप के 8 हजार से ज्यादा फॉलोअर हैं। डेमी एंड कॉपर एडवरटाइजिंग एंड डीसी इंटरएक्टिव ग्रुप द्वारा की गई स्टडी में सामने आया कि सोशल मीडिया पर मौजूद मेडिकल रिलेटेड इन्फॉर्मेशन को 18 से 25 साल के युवा सही मानते हैं, इसलिए ब्लड डोनेशन से युवाओं को जोडऩे के लिए फेसबुक और ट्विटर पर कैंपेनिंग एक बेहतर माध्यम है। फेसबुक पर ब्ल्ड डोनर ग्रुप सोशल ब्लड के फाउंडर कार्तिक नारालशेट्टी के मुताबिक मेरे पड़ोसी एक भारतीय परिवार को रोजाना ब्ल्ड की जरूरत होती थी, क्योंकि उनकी 4 साल की बेटी थैलीसीमिया की मरीज थी। वर्तमान समय में 40 मिलीयन से ज्यादा भारतीय इस बीमारी के मरीज हैं जिन्हें समय-समय पर रक्त की जरूरत होती है। 2011 से अब तक 41हजार 64९ लोगों को अपने इस अभियान का हिस्सा बना चुके कार्तिक के मुताबिक लोग कहानी से प्रेरणा लेते हैं फैक्ट से नहीं। कार्तिक के मुताबिक हर रोज 100 लोग खून की कमी से मर रहे हैं, इसलिए हमें रक्तदान करना चाहिए इसके बजाय मेरे स्कूल में एक बच्चे को ब्लड की जरूरत थी, मैंने ब्लड देकर उसकी जिंदगी बचाई इससे लोग ज्यादा प्रेरित होंगे।
 पहला ब्लड बैंक
ब्लड डोनेशन के बाद ब्ल्ड और ब्ल्ड कंपोनेंट को ब्ल्ड बैंक में सहेजकर रखने की प्रक्रिया होती है। आज ब्लड बैंक दुनिया में जगह-जगह मौजूद हैं लेकिन दुनिया में पहला ब्लड बैंक अमेरिका के न्यूयार्क शहर के माउंट सिनाई हॉस्पिटल में रिचर्ड लेविसन ने स्थापित किया था।
एप खोजेगा ब्ल्ड डोनर
ब्लड डोनेशन के लिए एफबी, ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया के साथ ही अब मोबाइल एप का भी प्रयोग होने लगा है। देश में ब्लड डोनेशन की फील्ड में पिछले 8 साल से काम करने वाले ऑर्गनाइजेशन द्घह्म्द्बद्गठ्ठस्रह्य२ह्यह्
वश्चश्चशह्म्ह्ल.शह्म्द्द ने एक मोबाइल एप लांच किया है। जिसे एंड्रायड, जावा, विंडो और आईओएस प्लेटफार्म पर अपने स्मार्टफोन में लांच किया जा सकता है। इस एप के माध्यम से व्यक्ति देश के किसी भी प्रदेश के किसी शहर में मौजूद डोनर से कॉन्टेक्ट कर सकता है, डोनर के तौर पर रजिस्ट्रेशन करने से लेकर कॉल, एसएमएस की सर्विस भी डोनर के लिए मौजूद है
थैंक्यू अंकल....
थैलेसीमिया पीडि़त एक बच्ची जब टेलीविजन पर आकर थैंक्यू अंकल बोलती है ब्ल्ड डोनेशन के लिए तो वह इमोशनल अपील दिल को छू जाती है। थैलेसीमिया की बीमारी की एड कैंपेन को लेकर बड़े अवेयरनेस के कारण अब लोग आगे बढ़कर ब्लड डोनेशन कर रहे हैं। ऐसें में टीवी पर जब कोई सेलिब्रिटी यह कहती है करके देखिए अच्छा लगता है, तो वह भी कितने ही लोगों को रक्तदान के लिए एक मार्मिक अपील होती है। रक्तदान के प्रति यह जागरूरक और संवेदनशील अभियान ही रक्तदान के लिए प्रेरित कर रहा है।

ग्रुपिंग ने भी किया अपील
एक इंजीनियरिंग स्टूडेंट ने जब अपने हॉस्टल में रहकर साथ पढऩे वाले बैचमेट को ब्लड देकर बचाया तो उसके ग्रुप के कितने ही दोस्त प्रेरित हुए ब्ल्ड डोनेड करने के लिए। यानी की यंगस्टर की यह कॉलेज गैंग भी ब्ल्ड डोनेशन को बढ़ा रही है। लोकल लेवल पर अलग-अलग युवा संगठन से लेकर सामाजिक संगठन भी ब्लड डोनेशन कैंप के माध्यम से लोगों को ब्लड डोनेशन के लिए प्रेरित करते हैं।

Friday, 6 June 2014

अनूठा रिश्ता जो है खास





रक्षाबंधन वह पावन पर्व  है जिसका भाई -बहन के रिश्ते से बड़ा गहरा नाता है। देखने में तो यह रिश्ता �ाी हमसे जुड़े दूसरे रिश्तों की ही तरह है, लेकिन इसमें कुछ तो �ाास है जो इसे उनसे जुदा और अलग बनाता है।

रेशम की कच्ची डोर कितना कुछ कहती है यदि उसके �ाावों को समझने का प्रयास किया जाए। इसमें एक भाई के प्रति बहन का स्नेह दि�ाता है तो बहन के प्रति �ााई के मन में भरा प्यार, कर्तव्य और परवाह के रूप में नजर आता है। बचपन में छोटी-छोटी बातों पर होती है तकरार और फिर शाम तक संग हो जाना।
    वाकई इस रिश्ते की महक हमेशा यूं ही बनी रहे तो कितना अच्छा लगता है। कभी-क�ाी तो लगता है वह बचपन वापस लौट आए । वैसे भी हर राखी पर यूं ही हम पुरानी यादों में खो ही जाते हैं, जो क�ाी आ�ाों में नमी तो कभी चेहरे पर मुस्कान बि�ोर जाती है।

-कितना अलग होता है यह रिश्ता
-हर नाते से जुदा रहता है
-नि: स्वार्थ प्रेम इसमें होता है
-बिना तकरार के अधूरा सा लगता है
-क�ाी गुस्सा  क�ाी शरारत तो कभी प्यार
-कभी सारी दुनिया इस रिश्ते में सिमटी लगती है
-कितना अजीब होता है  यह रिश्ता
-यह कहलाता है भाई - बहन का रिश्ता      

                                                      सर्जना चतुर्वेदी