SARJANA CHATURVEDI
SARJANA CHATURVEDI
Tuesday, 6 January 2015
Thursday, 13 November 2014
भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान आईआईएसईआर विज्ञान की ओर बढ़ाएं अपने कदम
| भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान आईआईएसईआर विज्ञान की ओर बढ़ाएं अपने कदम |
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अगर
बचपन से ही विज्ञान के अलग-अलग पहलुओं से जुड़े सवाल आपको परेशान करते हैं
और जब तक आप उनका जवाब नहीं जान लेते हैं, तब तक आपको सुकून नहीं मिलता है,
तो समझ लीजिए कि विज्ञान ही आपका पसंदीदा विषय है। विज्ञान के क्षेत्र में
रुचि रखने वाले अनुसंधान से जुड़े भारतीय छात्रों के लिए भारत सरकार ने
भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान को स्थापित किया है। यह शिक्षण
और अनुसंधान विज्ञान के प्रति आपकी रुचि को देखते हुए आपके ज्ञान को विकसित
करने में अपनी भूमिका निभाता है। मध्यप्रदेश में अध्ययन करने वाले छात्रों
के लिए गौरव की बात है कि 2008 में यह संस्थान प्रदेश की राजधानी भोपाल
में भी शुरू हो गया। विज्ञान विषय में ही यदि आप अपना कॅरियर बनाने की चाह
रखते हैं तो निश्चित ही इस संस्थान में प्रवेश ले सकते हैं।
क्यों की गई स्थापना
प्रो. सी.एन.आर. राव की अध्यक्षता में प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक परामर्शी
परिषद (एसएसी-पीएम) ने विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान को समर्पित पांच नए
संस्थानों की स्थापना करने की सिफारिश की थी, जिसका नाम आईआईएस बंगलौर की
तर्ज पर ‘भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान परिषद’ होगा।
इन संस्थानों का लक्ष्य आधुनिक अनुसंधान सहित एकीकृत आधारभूत विज्ञान में
शिक्षण और शिक्षा के ऊंचे मानकों के अनुसंधान केन्द्र स्थापित करना है। ये
संस्थान अनुसंधान के बौद्धिक वातावरण में विज्ञान में अवरस्नातक और
स्नातकोत्तर शिक्षण को समर्पित होंगे और विज्ञान के एकीकृत शिक्षण और
अध्ययन में अवसर प्रदान करके आधारभूत विज्ञान में युवाओं को आकर्षक रोज़गार
प्रदान करेंगे।
आईआईएसईआर स्थापना का
लक्ष्य -
आधारभूत विज्ञान में गुणवत्तायुक्त शिक्षा और अनुसंधान प्रदान करना।
उच्च गुणवत्तायुक्त शैक्षिक संकाय को आकर्षित और पोषित करना।
कम उम्र में अनुसंधान में प्रवेश प्रदान करने के उद्देश्य से विज्ञान में
एकीकृत स्नातकोत्तर कार्यक्रम प्रारंभ करना इसके अतिरिक्त यह संस्थान
विज्ञान में अवर स्नातक डिग्री रखने वाले स्नातकोत्तर और पीएचडी के एकीकृत
कार्यक्रम प्रदान करेगा। विज्ञान में लचीले पाठ्यक्रम को संभव बनाना।
वर्तमान विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के साथ सशक्त संबंध स्थापित करना और
प्रयोगशाला और संस्थाओं के साथ नेटवर्क स्थापित करना। उन्नत अनुसंधान
प्रयोगशालाएं और केन्द्रीय सुविधाएं स्थापित करना। उन्नत अनुसंधान
प्रयोगशालाएं और केन्द्रीय सुविधाएं स्थापित करना।
यह कोर्स कर सकते हैं
बीएसएमएस-ड्यूल डिग्री प्रोग्राम
बीएसएमएस - बैचलर ऑफ साइंस, मास्टर ऑफ साइंस 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के
बाद बीएसएमएस के कोर्स में एडमीशन लिया जा सकता है। इस कोर्स को बायोलॉजिकल
साइंस, केमिस्ट्री, मैथमेटिक्स, फिजिक्स में किया जा सकता है।
डॉक्टरल प्रोग्राम-पीएचडी
ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद कुछ स्टूडेंट्स
जॉब करने की चाह रखते हैं तो कुछ पीएचडी करके रिसर्च की फील्ड में जाने की
चाह रखते हैं। इसलिए यदि आप पोस्ट ग्रेजुएशन कंप्लीट करने के बाद पीएचडी
करने की चाह रखते हैं तो आईआईएसईआर के डॉक्टरल प्रोग्राम पीएचडी में आप
प्रवेश ले सकते हैं।
इन विषयों में कर सकते हैं पीएचडी
बायोलॉजिकल साइंस, केमिस्ट्री
अर्थ एंड एन्वायरमेंटल साइंस
मैथमेटिक्स, फिजिक्स
ऐसे मिलेगा प्रवेश
अगर आप पीएचडी कार्यक्रम में प्रवेश लेना चाहते हैं तो उसके लिए आपको
संबंधित विषय में एमएससी, एमएस, एमटेक या एमबीबीएस समेत मास्टर डिग्री होना
जरूरी है।
इसके साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली प्री पीएचडी प्रवेश परीक्षा को
भी क्वालीफाई करना जरूरी है। इसके साथ ही इंजीनियरिंग के छात्र को ग्रेजुएट
एप्टीट्यूट टेस्ट में भी एक अच्छी रैंक होना जरूरी है या फिर काउंसिल ऑफ
साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रीयल रिसर्च सीएसआईआर, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग
यूजीसी द्वारा आयोजित की जाने वाली नेट, जेआरएफ या उसके समकक्ष परीक्षा पास
किए हुए प्रतिभागी भी इस कोर्स में शामिल हो सकते हैं।
पीएचडी कार्यक्रम के लिए चयनित युवा किसी अन्य स्कॉलरशिप को प्राप्त नहीं कर सकते हैं।
इन विषयों में कर सकते हैं पीएचडी
बायोलॉजीकल साइंस, केमिस्ट्री
अर्थ एंड एन्वायरमेंटल साइंस
मैथमेटिक्स
फिजिक्स
पीएचडी प्रोग्राम में शामिल होने वाले प्रतिभागियों को कोर्स वर्क,
क्वालीफाइंग एग्जाम, डिजर्टेशन के अलावा विभिन्न सेमिनार, कॉन्फ्रेंस,
वर्कशॉप में हिस्सा लेने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है, ताकि वह अपनी
क्षमता का अधिक से अधिक बेहतर उपयोग कर सकें।
यह सुविधाएँ हैं मौजूद
ई-लाइब्रेरी और कंप्यूटर सेंटर
छात्रों को पढ़ने के लिए विषय संबंधी किताबें और रिसर्च जर्नल, ई-बुक
आईआईएसईआर की लाइब्रेरी में मौजूद है। इसके साथ ही लाइब्रेरी इंटरनेट से
कनेक्ट है, साथ ही देश में मौजूद अन्य आईआईएसईआर की लाइब्रेरी की भी
इंटरनेट लिंक लाइब्रेरी में उपलब्ध हैं। इसके साथ ही अपडेट कंम्प्यूटर
इंटरनेट फेसिलिटी के साथ यहाँ मौजूद हैं।
रिसर्च के लिए अत्याधुनिक उपकरण मौजूद
संस्थान में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को रिसर्च के लिए आवश्यक अत्याधुनिक
उपकरण भी यहाँ मौजूद हैं। इसके साथ ही हॉस्टल, कॉन्फ्रेंस हॉल,
ट्रांसपोर्ट, हेल्थ सेंटर, ई-क्लास रूम की सुविधाएं भी यहाँ छात्र-छात्राओं
के लिए हैं।
कॅरियर की राह
यदि आप रिसर्च के क्षेत्र में जाना चाहते हैं या फिर वैज्ञानिक के तौर पर
अपना कॅरियर बनाने की चाह रखते हैं तो आईआईएसईआर आपको इसके लिए संभावनाएं
उपलब्ध कराता है। इसके साथ ही यहां से पढ़ाई करने के बाद आप टीचिंग की फील्ड
में भी अपना बेहतर कल देख सकते हैं। संस्थान में कॅरियर डेवलपमेंट सेंटर
के माध्यम से छात्रों की भी कॅरियर संबंधी समस्याओं का समाधान किया जाता
है।
ऐसे मिलेगा प्रवेश
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईएसईआर) के ड्यूअल
डिग्री पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए आवेदन प्रक्रिया की शुरुआत जून-जुलाई
में होती है। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा संचालित आईआईएसईआर के
पाँचों कैंपस में एक साथ प्रवेश प्रक्रिया आयोजित की जाती है। विज्ञान
विषयों में मौलिक शोध और शिक्षण कार्य को बढ़ावा देने के लिए इन विशिष्ट
संस्थानों की स्थापना की गई थी। सबसे पहले वर्ष 2006 में पुणे और कोलकाता
में ये संस्थान अस्तित्व में आए। इसके बाद 2007 में मोहाली और अगले साल
तिरवनंतपुरम और भोपाल में इनकी स्थापना हुई।
दाखिले के लिए जरूरी योग्यता, चयन की प्रक्रिया और आवेदन से संबंधित सभी महत्वपूर्ण जानकारी -
बीएस-एमएस (ड्यूअल डिग्री)
उपलब्ध सीट - 950
अवधि - पाँच साल
शैक्षणिक योग्यता किसी मान्यता प्राप्त स्कूल शिक्षा बोर्ड/यूनिवर्सिटी से विज्ञान विषयों के साथ बारहवीं पास।
चयन प्रक्रिया
- आईआईएसईआर में छात्रों के दाखिले के लिए तीन माध्यमों का उपयोग किया जाता है।
- पहला माध्यम है किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना (केवीपीवाई) की बेसिक
साइंस स्ट्रीम। इस योजना के तहत एसए/एसएक्स/एसबी में क्वालीफाई कर चुके
छात्र आवेदन कर सकते हैं।
- दूसरा माध्यम है आईआईटी में प्रवेश के लिए आयोजित होने वाला जेईई
(एडवांस्ड), इस साल इस परीक्षा में आईआईटी में दाखिले के लायक रैंक प्राप्त
करने वाले छात्र यहाँ प्रवेश के लिए आवेदन कर सकते हैं। ऐसे आवेदकों का 60
फीसदी अंकों के साथ बारहवीं पास होना भी जरूरी है।
- आखिरी माध्यम है राज्यों या केंद्र के स्कूल शिक्षा बोर्ड। जो छात्र
अपने स्कूल शिक्षा बोर्ड से बारहवीं की परीक्षा (2013 या 2014) में मिले
औसत अंकों के आधार पर इंस्पायर स्कॉलरशिप के लिए योग्य हैं, वह आईआईएसईआर
में प्रवेश ले सकते हैं। ‘इंस्पायर’ के लिए केंद्र सरकार का डिपार्टमेंट ऑफ
साइंस एंड टैक्नोलॉजी कट ऑफ प्रतिशत निर्धारित करता है।
ओबीसी और शारीरिक अशक्त वर्ग के छात्रों का तय कट ऑफ में पाँच फीसदी की
राहत मिलेगी। हालांकि एससी और एसटी क लिए कट ऑफ 55 फीसदी रखा गया है। इस कट
ऑफ में आने वाले छात्रों को आईआईएसईआर के एप्टीट्यूट टेस्ट को भी पास करना
होगा।
- कुल सीटों का 50 फीसदी जेईई (एडवांस्ड) के माध्यम से भरा जाएगा और 25
बोर्डों के उन 12वीं पास छात्रों से भरा जाएगा, जो आईआईएसईआर के एप्टीट्यूड
टेस्ट की
शीर्ष रैंकिंग में स्थान पाएंगे।
एप्टीट्यूट टेस्ट का प्रारूप
- यह परीक्षा कुल 60 बहुविकल्पीय प्रश्नों पर आधारित होती है। ये प्रश्न
बायोलॉजी, केमिस्ट्री, मैथमेटिक्स और फिजिक्स से संबंधित होंगे। चारों
विषयों से 15-15 प्रश्न पूछे जाएंगे। प्रश्न 11वीं और 12वीं के पाठ्यक्रम
पर आधारित होंगे।
- प्रश्नों को हल करने के लिए 180 मिनट का समय मिलेगा।
- हर प्रश्न तीन अंक का होगा और गलत जवाब देने पर एक अंक काटा जाएगा।
टेस्ट का आयोजन
देश के 15 शहरों में एप्टीट्यूट टेस्ट आयोजित किया जाता है। इनमें
वाराणसी, दिल्ली, कोलकाता, भोपाल, पुणे, तिरुवनंतपुरम, मोहाली और भुवनेश्वर
आदि शहर शामिल हैं।
आवेदन शुल्क
- सामान्य और ओबीसी वर्ग के छात्रों के लिए शुल्क 600 रुपये है।
- यह शुल्क एससी और एसटी वर्ग के लिए 300 रुपये निर्धारित किया गया है।
- इसका भुगतान एसबीआई की नेट बैंकिंग सेवा के माध्यम से किया जा सकता है।
जरूरी सूचनाएँ
- केवीपीवाई या जेईई (एडवांस्ड) माध्यम से आवेदन करने वाले छात्रों को
उनकी रैंकिंग के अनुसार सीधे काउंसलिंग में शामिल होने का मौका मिलेगा। ऐसे
छात्र पाँच आईआईएसईआर में से किसी एक में काउंसलिंग के लिए पहुंच सकते
हैं।
- जो छात्र चयन प्रक्रिया से संबंधित तीनों माध्यमों की योग्यता को पूरा
करते हैं, वह तीनों माध्यमों से आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए अलग-अलग फॉर्म
भरने होंगे और आवेदन शुल्क भी अलग-अलग ही देना होगा।
- काउंसलिंग में शामिल होने के लिए उन्हीं छात्रों को बुलाया जाएगा, जो उपलब्ध सीटों के अनुसार रैंकिंग या मेरिट में स्थान प्राप्त करेंगे। आवेदन प्रक्रिया
- वेबसाइट (www.iiser-admi ssion s.in) के होमपेज पर उपलब्ध लिंक पर क्लिक करें।
- इसके बाद ‘गो टू एप्लीकेशन फॉर्म’ ऑप्शन पर क्लिक करके फॉर्म को भरें। फिर आवेदन शुल्क का भुगतान करें और फॉर्म को सबमिट करें।
अधिक जानकारी यहाँ
फोन- 0755-6692409
ई-मेल :admissions@iiserb.ac.in पर भी कर सकते हैं।
देश में स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान
1. भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान (आईआईएसईआर), कोलकाता आईआईएसईआर कोलकाता अगस्त 2006 में स्थापित किया गया।
आईआईएसईआर कोलकाता एकीकृत बीएस-एमएस कार्यक्रम, एमएस कार्यक्रम, एकीकृत
पीएचडी कार्यक्रम, पीएचडी कार्यक्रम और पोस्ट डॉक्टरल कार्यक्रम प्रदान
करता है। अधिक जानकारी के लिए कृपया http://www.iiserkol.ac.in पर क्लिक
करें।
2. भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर), पुणे
आईआईएसईआर पुणे 2006 में स्थापित किया गया जो आधारभूत विज्ञान में
अनुसंधान और शिक्षण प्रदान करने के लिए समर्पित मुख्य संस्थान है। एकीकृत
मास्टर कार्यक्रम का लक्ष्य बॉयोलॉजिकल, कैमिकल, मैथामेटिकल और फिजिकल
साइंस में पारंपरिक विषयों को साथ लाते हुए विज्ञान शिक्षा अनुभव के साथ
पारंपरिक अवर स्नातक और स्नातकोत्तर कार्यक्रम को एकीकृत करना है। यह
कार्यक्रम विज्ञान के समान प्रकृति पर फोकस करता है। अधिक जानकारी के लिए
कृपया http:/www.iiserpune.ac.in पर क्लिक करें।
3. भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर), मोहाली
आईआईएसईआर मोहाली वर्ष 2007 से स्वायत्त शैक्षिक संस्थान के रूप में
स्थापित किया गया। जिसका उद्देश्य अवर स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर
गुणवत्तायुक्त विज्ञान शिक्षा और विज्ञान के मुख्य क्षेत्रों में अनुसंधान
प्रदान करना है। आईआईएसईआर मोहाली का मुख्य फोकस शिक्षा के साथ वैज्ञानिक
अनुसंधान में एकीकृत उत्कृष्टता पर है।
आईआईएसईआर मोहाली एकीकृत स्नातकोत्तर स्तर के कार्यक्रम, डॉक्टरल
कार्यक्रम एकीकृत डॉक्टरल कार्यक्रम प्रदान करता है। अधिक जानकारी के लिए
कृपया http://www.iisermohali.ac.in पर क्लिक करें।
4. भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर), भोपाल
आईआईएसईआर भोपाल अवर स्नातक और स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को उच्च
गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से वर्ष 2008 में स्थापित
किया गया था। वर्तमान में आईआईएसईआर भोपाल बीएस-एमएस (दोहरी डिग्री)
कार्यक्रम पीएचडी कार्यक्रम प्रदान करता है। अधिक जानकारी के लिए कृपया
http://www.iiserbhopal.ac.in पर क्लिक करें।
5. भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) तिरुवनंतपुरम
भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर)
तिरुव-नंतपुरम अगस्त 2008 में स्थापित किया गया था और अंतर्राष्ट्रीय
मानकों के वैज्ञानिक अनुसंधान और विज्ञान शिक्षा प्रदान करने के लिए
समर्पित है। भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर)
तिरूवनंतपुरम, गणित, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान और
अंतरविषयक क्षेत्रों में पाँच वर्षीय एकीकृत एमएस और पीएचडी कार्यक्रम
प्रदान करता है। अधिक जानकारी के लिए http://www.iisertvm.ac.in पर क्लिक
करें।
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Wednesday, 29 October 2014
- सािहत्य में अपनी ही िजंदगी का ताना-बाना - रिचर्ड फ्लेंगन
शख्सियत - िरचर्ड फ्लेंगन
- सािहत्य में अपनी ही िजंदगी का ताना-बाना - रिचर्ड फ्लेंगन
- संघर्ष के सृजन का सफर
जब कोई सािहत्यकार अपनी कृित का सृजन करता है तो वह निश्चत ही उस समय यह नहीं जानता िक उसकी कौन सी कृित सर्वश्रेष्ठ होगी या नहीं वह िसर्फ अपनी ओर से सिर्फ प्रयास करता है। ऐसा ही प्रयास करके हाल ही में मैन बुकर पुस्कार जीतकर चर्चा में आए हैं ऑस्ट्रेलिया के रिचर्ड फ्लेंगन। रिचर्ड की यह किताब इसलिए भी खास है क्योंिक यह िकताब एक लेखक ने नहीं बल्कि एक बेटे ने अपने िपता और अन्य कैदियों द्वारा भोगी गई यातनाओं का वर्णन करती हुई है। द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ को अपने जीवन के 12 बरस देकर िलखने वाले तस्मानिया में जन्मे रिचर्ड ने इसे अपने िपता कैदी नंबर 335 को समर्पित किया है। फ्लेंगन के जीवन, साहित्य सृजन का एक सफर।
16 बरस में छोड़ा स्कूल बाद में बने टॉपर
िरचर्ड के जीवन के संघर्ष का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है िक उनके पिता एक कैदी थे। तस्मानिया के रोजबेरी टाउन में 1961 में जन्मे रिचर्ड अपने माता-पिता की 6 संतानों में से 5वे नंबर की संतान है। रिचर्ड ने भले ही बुकर हासिल िकया हो मगर उनके दादा-दादी गरीब के साथ-साथ अशिक्षित थे लेिकन फ्लेंगन के माता-िपता शिक्षा के महत्व को जानते थे और इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को हर कीमत पर शिक्षा पाने के लिए प्रेरित िकया। फ्लेंगन ने अपने अिभभावक की इस बात के महत्व को समझा और गरीबी के चलते भले ही उन्होंने 16 बरस की उम्र में स्कूल छोड़कर मजदूरी की और तब वह एक बढ़ई बनने की चाह भी रखने लगे थे लेिकन अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के बूते
फ्लेंगन ने 1982 में तस्मानिया यूनिवर्सिटी से फर्स्ट क्लास ऑनर के साथ अपनी ग्रेजुएशन की िडग्री हासिल की। बाद में रॉडेस स्कॉलरशिप लेकर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ लैटर्स डिग्री प्राप्त की।
िजंदगी की कड़वाहट को बुना मीठे शब्दों में
अक्सर कहा जाता है कि अपने जीवन की बुरी यादों को याद नहीं रखना चाहिए लेिकन अपने पिता, अपने परिवार और खुद अपने जीवन की कड़वाहट को खूबसूरत शब्दों में ढालकर रिचर्ड फ्लेंगन ने अपने साहित्य का सृजन िकया है। यह वाकई एक अिद्वतीय िमसाल है। िरचर्ड के भाई और पत्रकार,लेखक मािर्टन फ्लेंगन के मुताबिक रिचर्ड को नदी में तैरना बचपन से ही पसंद था। जब वह 11 साल का था तब मैं और मेरा भाई िटम नदी में तैरते हुए रिचर्ड के नजर न आने को लेकर कई बार परेशान भी हो जाते थे तभी अचानक उसके नन्हें हाथों के नजर आने पर खुश हो जाते थे। लहरों से संघर्ष के इस खेल ने ही िरचर्ड को बहादुरी के साथ संघर्ष करना सिखा दिया था। मार्टिन ने एक ऑस्ट्रेिलयाई अखबार के लिए लिखा है कि 1997 में जब रिचर्ड का पहला नॉवेल डेथ अॉफ अ रिवर गाइड आया और उसे मैंने पढ़ा तो मुझे लगा कि इसके हर िबंदू को मैं जानता हूं, बस िरचर्ड ने उन्हें एक फ्रेम में शब्दों के साथ मढ़ िदया। बतौर मार्टिन इसी तरह 2002 में प्रकाशित हुए फ्लेंगन के नॉवेल गुल्ड बुक ऑफ ए िफश भी उसके बचपन की ही यादों से जुड़ा है क्योंिक वह जहां बचपन में रहता था वह गांव खदान, पहाड़ और नदी से घिरा हुआ था। और बुकर पुरस्कार फ्लेंगन के जिस उपन्यास को िमला है द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ वह डेथ रेल्वे के नाम से पहचाने जाने वाले बर्मा - थाइलैंड पर केिन्द्रत है। हमारे िपता आर्की फ्लेंगन जो एक आम आदमी थे और उनके जैसे लाखों
कैिदयों का संघर्ष इस नॉवेल में फ्लेंगन ने िलखा है। जापानी साम्राज्य के क्रूर अत्याचार और लाखों गुलामों की मदद से 1943में बनाए गए इस रेल मार्ग को लेकर लोगों के संघर्ष को फ्लेंगन ने प्यार और अन्य खूबसूरत घटनाक्रमों के साथ आकार िदया है। मािर्टन के शब्दों में इसलिए जब मैंने इस नॉवेल को एक साल पहले लांच िकया था तभी कहा था िक इसका बढ़ा प्रभाव होगा।
िपता की चाह थी और वह पूरी हुई
यह दुर्लभ सा संयोग ही है कि फ्लेंगन के पिता शायद इस नॉवेल के पूरे होने का ही इंतजार कर रहे थे, क्योंिक फ्लेंगन का यह उपन्यास जिस डेथ रेल्वे पर केिन्द्रत है। फ्लेंग
के पिता उसके निर्माण कार्य में लगे एक कैदी थे। अपने आपको डैथ रेल्वे का बेटा कहने वाले फ्लेंगन जब इस उपन्यास को पूरा कर रहे थे। तभी उनके िपता की याददाश्त धीरे-धीरे बिल्कुल खत्म होने लगी थी और फ्लेंगन को कुछ भी उस दौर का बता पाने में असमर्थ हो गए थे। तब फ्लेंगन ने तस्मािनया जाकर उस दौर के लोगों से मुलाकात की और िस्थति को जाना। फ्लेंगन के मुतािबक इस किताब को िलखते समय कई बार लगा कि यह शायद पूरा नहीं हो पाएगा मगर सिर्फ मेरे पिता को भरोसा था िक मैं इसे पूरा कर लूंगा। उपन्यास लेखन के अंतिम छ: महीने तस्मािनया में ही रहकर उसे पूरा करने वाले फ्लेंगन के 99 वर्षीय िपता जो िक फ्लेंगन की बहन के साथ रहते थे, एक दिन कॉल करके फ्लेंगन से उपन्यास पूरा होने के बारे में पूछा और फ्लेंगन ने बताया िक हां वह पूरा हो गया है और उसे मैंने प्रकाशक को ईमेल कर िदया है, यह जानने के चंद घंटों बाद ही उसी रात फ्लेंगन के पिता ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
अिवस्मरणीय है मेरे लिए यह क्षण
रिचर्ड फ्लेंगन को जब लंदन में मैन बुकर पुरस्कार से सम्मानित करते हुए उन्हें डचेस ऑफ कॉर्नवाल ट्राफी और 50 हजार पाउंड से सम्मानित किया गया तब फ्लेंगन ने कहा िक ऑस्ट्रेलिया में बुकर सम्मान को भाग्यशाली चिकन के तौर पर देखा जाता है और मुझे यह िमल रहा है। यह मेरे लिए गर्व की बात है। रिचर्ड ने कहा कि मैं साहित्य की परंपरा से नहीं आता हूं, मेरे दादा-दादी अनपढ़ थे। मैं एक छोटे से कस्बेे से आता हूं जो पर्वत और बारिश से िघरा हुआ आइसलैंड है। फ्लेंगन ने कहा िक मैंने यह कभी नहीं सोचा था िक लंदन के इस ग्रेंड हॉल में मुझे कभी सम्मानित किया जाएगा। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। इस दौरान फ्लेंगन ने िपता को समर्पित करते हुए इस सम्मान के लिए िनर्णायकों को धन्यवाद िदया। साथ ही 30 सालों से हर पल साथ िनभाने वाली अपनी पत्नी माजदा को लेखन के इस सफर में साथ देने के लिए शुिक्रया अदा िकया और अपने उपन्यास की प्रकाशक निक्की िक्रस्टर को भी धन्यवाद दिया।
तस्मानिया के पहले और ऑस्ट्रेिलया के तीसरे बुकर
सम्मान
2014 मैन बुक प्राइज, िब्रटेन
2011 तस्मािनया बुक प्राइज, वॉनि्टंग
2009 क्वीनसलैंड प्रीमियर लिटररी अवार्ड एंड फिक्शन वॉनि्टंग
2009 मिल्स फ्रेंकलिन अवॉर्ड, ऑस्ट्रेिलया वॉनि्टंग शॉर्टलिस्ट
2008 वेस्टर्न ऑस्ट्रेिलयन प्रीमियर लिटररी अवॉर्ड फॉर फिक्शन वॉनि्टंग
2002 कॉमनवेल्थ राइटर्स प्राइज - गुल्ड बुक ऑफ फिश- अ नॉवेल इन ट्वेलव फिश
कृितयां
2013 द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ
2009 वॉनि्टंग
2007 अननोन टेरेिरस्ट
2002 गुल्ड बुक ऑफ ए फिश-अ नॉवेल इन ट्वेलव फिश
1998 द साउंड ऑफ वन हेंड क्लेपिंग
1997 डेथ अॉफ अ रिवर गाइड
- सािहत्य में अपनी ही िजंदगी का ताना-बाना - रिचर्ड फ्लेंगन
- संघर्ष के सृजन का सफर
जब कोई सािहत्यकार अपनी कृित का सृजन करता है तो वह निश्चत ही उस समय यह नहीं जानता िक उसकी कौन सी कृित सर्वश्रेष्ठ होगी या नहीं वह िसर्फ अपनी ओर से सिर्फ प्रयास करता है। ऐसा ही प्रयास करके हाल ही में मैन बुकर पुस्कार जीतकर चर्चा में आए हैं ऑस्ट्रेलिया के रिचर्ड फ्लेंगन। रिचर्ड की यह किताब इसलिए भी खास है क्योंिक यह िकताब एक लेखक ने नहीं बल्कि एक बेटे ने अपने िपता और अन्य कैदियों द्वारा भोगी गई यातनाओं का वर्णन करती हुई है। द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ को अपने जीवन के 12 बरस देकर िलखने वाले तस्मानिया में जन्मे रिचर्ड ने इसे अपने िपता कैदी नंबर 335 को समर्पित किया है। फ्लेंगन के जीवन, साहित्य सृजन का एक सफर।
16 बरस में छोड़ा स्कूल बाद में बने टॉपर
िरचर्ड के जीवन के संघर्ष का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है िक उनके पिता एक कैदी थे। तस्मानिया के रोजबेरी टाउन में 1961 में जन्मे रिचर्ड अपने माता-पिता की 6 संतानों में से 5वे नंबर की संतान है। रिचर्ड ने भले ही बुकर हासिल िकया हो मगर उनके दादा-दादी गरीब के साथ-साथ अशिक्षित थे लेिकन फ्लेंगन के माता-िपता शिक्षा के महत्व को जानते थे और इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को हर कीमत पर शिक्षा पाने के लिए प्रेरित िकया। फ्लेंगन ने अपने अिभभावक की इस बात के महत्व को समझा और गरीबी के चलते भले ही उन्होंने 16 बरस की उम्र में स्कूल छोड़कर मजदूरी की और तब वह एक बढ़ई बनने की चाह भी रखने लगे थे लेिकन अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के बूते
फ्लेंगन ने 1982 में तस्मानिया यूनिवर्सिटी से फर्स्ट क्लास ऑनर के साथ अपनी ग्रेजुएशन की िडग्री हासिल की। बाद में रॉडेस स्कॉलरशिप लेकर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ लैटर्स डिग्री प्राप्त की।
िजंदगी की कड़वाहट को बुना मीठे शब्दों में
अक्सर कहा जाता है कि अपने जीवन की बुरी यादों को याद नहीं रखना चाहिए लेिकन अपने पिता, अपने परिवार और खुद अपने जीवन की कड़वाहट को खूबसूरत शब्दों में ढालकर रिचर्ड फ्लेंगन ने अपने साहित्य का सृजन िकया है। यह वाकई एक अिद्वतीय िमसाल है। िरचर्ड के भाई और पत्रकार,लेखक मािर्टन फ्लेंगन के मुताबिक रिचर्ड को नदी में तैरना बचपन से ही पसंद था। जब वह 11 साल का था तब मैं और मेरा भाई िटम नदी में तैरते हुए रिचर्ड के नजर न आने को लेकर कई बार परेशान भी हो जाते थे तभी अचानक उसके नन्हें हाथों के नजर आने पर खुश हो जाते थे। लहरों से संघर्ष के इस खेल ने ही िरचर्ड को बहादुरी के साथ संघर्ष करना सिखा दिया था। मार्टिन ने एक ऑस्ट्रेिलयाई अखबार के लिए लिखा है कि 1997 में जब रिचर्ड का पहला नॉवेल डेथ अॉफ अ रिवर गाइड आया और उसे मैंने पढ़ा तो मुझे लगा कि इसके हर िबंदू को मैं जानता हूं, बस िरचर्ड ने उन्हें एक फ्रेम में शब्दों के साथ मढ़ िदया। बतौर मार्टिन इसी तरह 2002 में प्रकाशित हुए फ्लेंगन के नॉवेल गुल्ड बुक ऑफ ए िफश भी उसके बचपन की ही यादों से जुड़ा है क्योंिक वह जहां बचपन में रहता था वह गांव खदान, पहाड़ और नदी से घिरा हुआ था। और बुकर पुरस्कार फ्लेंगन के जिस उपन्यास को िमला है द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ वह डेथ रेल्वे के नाम से पहचाने जाने वाले बर्मा - थाइलैंड पर केिन्द्रत है। हमारे िपता आर्की फ्लेंगन जो एक आम आदमी थे और उनके जैसे लाखों
कैिदयों का संघर्ष इस नॉवेल में फ्लेंगन ने िलखा है। जापानी साम्राज्य के क्रूर अत्याचार और लाखों गुलामों की मदद से 1943में बनाए गए इस रेल मार्ग को लेकर लोगों के संघर्ष को फ्लेंगन ने प्यार और अन्य खूबसूरत घटनाक्रमों के साथ आकार िदया है। मािर्टन के शब्दों में इसलिए जब मैंने इस नॉवेल को एक साल पहले लांच िकया था तभी कहा था िक इसका बढ़ा प्रभाव होगा।
िपता की चाह थी और वह पूरी हुई
यह दुर्लभ सा संयोग ही है कि फ्लेंगन के पिता शायद इस नॉवेल के पूरे होने का ही इंतजार कर रहे थे, क्योंिक फ्लेंगन का यह उपन्यास जिस डेथ रेल्वे पर केिन्द्रत है। फ्लेंग
के पिता उसके निर्माण कार्य में लगे एक कैदी थे। अपने आपको डैथ रेल्वे का बेटा कहने वाले फ्लेंगन जब इस उपन्यास को पूरा कर रहे थे। तभी उनके िपता की याददाश्त धीरे-धीरे बिल्कुल खत्म होने लगी थी और फ्लेंगन को कुछ भी उस दौर का बता पाने में असमर्थ हो गए थे। तब फ्लेंगन ने तस्मािनया जाकर उस दौर के लोगों से मुलाकात की और िस्थति को जाना। फ्लेंगन के मुतािबक इस किताब को िलखते समय कई बार लगा कि यह शायद पूरा नहीं हो पाएगा मगर सिर्फ मेरे पिता को भरोसा था िक मैं इसे पूरा कर लूंगा। उपन्यास लेखन के अंतिम छ: महीने तस्मािनया में ही रहकर उसे पूरा करने वाले फ्लेंगन के 99 वर्षीय िपता जो िक फ्लेंगन की बहन के साथ रहते थे, एक दिन कॉल करके फ्लेंगन से उपन्यास पूरा होने के बारे में पूछा और फ्लेंगन ने बताया िक हां वह पूरा हो गया है और उसे मैंने प्रकाशक को ईमेल कर िदया है, यह जानने के चंद घंटों बाद ही उसी रात फ्लेंगन के पिता ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
अिवस्मरणीय है मेरे लिए यह क्षण
रिचर्ड फ्लेंगन को जब लंदन में मैन बुकर पुरस्कार से सम्मानित करते हुए उन्हें डचेस ऑफ कॉर्नवाल ट्राफी और 50 हजार पाउंड से सम्मानित किया गया तब फ्लेंगन ने कहा िक ऑस्ट्रेलिया में बुकर सम्मान को भाग्यशाली चिकन के तौर पर देखा जाता है और मुझे यह िमल रहा है। यह मेरे लिए गर्व की बात है। रिचर्ड ने कहा कि मैं साहित्य की परंपरा से नहीं आता हूं, मेरे दादा-दादी अनपढ़ थे। मैं एक छोटे से कस्बेे से आता हूं जो पर्वत और बारिश से िघरा हुआ आइसलैंड है। फ्लेंगन ने कहा िक मैंने यह कभी नहीं सोचा था िक लंदन के इस ग्रेंड हॉल में मुझे कभी सम्मानित किया जाएगा। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। इस दौरान फ्लेंगन ने िपता को समर्पित करते हुए इस सम्मान के लिए िनर्णायकों को धन्यवाद िदया। साथ ही 30 सालों से हर पल साथ िनभाने वाली अपनी पत्नी माजदा को लेखन के इस सफर में साथ देने के लिए शुिक्रया अदा िकया और अपने उपन्यास की प्रकाशक निक्की िक्रस्टर को भी धन्यवाद दिया।
तस्मानिया के पहले और ऑस्ट्रेिलया के तीसरे बुकर
सम्मान
2014 मैन बुक प्राइज, िब्रटेन
2011 तस्मािनया बुक प्राइज, वॉनि्टंग
2009 क्वीनसलैंड प्रीमियर लिटररी अवार्ड एंड फिक्शन वॉनि्टंग
2009 मिल्स फ्रेंकलिन अवॉर्ड, ऑस्ट्रेिलया वॉनि्टंग शॉर्टलिस्ट
2008 वेस्टर्न ऑस्ट्रेिलयन प्रीमियर लिटररी अवॉर्ड फॉर फिक्शन वॉनि्टंग
2002 कॉमनवेल्थ राइटर्स प्राइज - गुल्ड बुक ऑफ फिश- अ नॉवेल इन ट्वेलव फिश
कृितयां
2013 द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ
2009 वॉनि्टंग
2007 अननोन टेरेिरस्ट
2002 गुल्ड बुक ऑफ ए फिश-अ नॉवेल इन ट्वेलव फिश
1998 द साउंड ऑफ वन हेंड क्लेपिंग
1997 डेथ अॉफ अ रिवर गाइड
Wednesday, 1 October 2014
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