SARJANA CHATURVEDI
SARJANA CHATURVEDI
Thursday, 29 December 2022
Tuesday, 26 April 2022
Tuesday, 2 October 2018
राष्ट्रपिता के जीवन के पांच प्रेरक प्रसंग
जब पहली बार जानी अहिंसा की ताकत : बापू ने अपने जीवन में लड़े आंदोलन चाहे
वह दक्षिण अफ्रीका में हुए हों या फिर भारत में हमेशा अहिंसा के अस्त्र के
साथ ही संघर्ष किया और देश को आजाद कराकर विजित भी हुए मगर यह भी एक सवाल
है कि आखिर बापू को अहिंसा पर इतना दृढ़ विश्वास क्यों था, उनकी आत्मकथा
में उद्रधृत उनके बालपन का एक किस्सा
1
बीड़ी के ठूंठ चुराने और इसी सिलसिले में नौकर के पैसे चुराने के दोष की तुलना में मुझसे चोरी का दूसरा जो दोष हुआ, उसे मैं अधिक गंभीर मानता हूं। इस चोरी के समय मेरी उम्र पंद्रह साल की रही होगी। यह चोरी मेरे मांसाहारी भाई के सोने के टुकड़े की थी। उन पर मामूली-सा, लगभग 25 रुपए का, कर्ज हो गया था। उसकी अदायगी के बारे में हम दोनों भाई सोच रहे थे। मेरे भाई के हाथ में सोने का ठोस का कड़ा था, उसमें से एक तोला सोना काट लेना मुश्किल न था। कड़ा कटा। कर्ज अदा हुआ। पर मेरे लिए यह बात असह्य हो गई। मैंने निश्चय किया कि आगे कभी चोरी करूंगा ही नहीं। मुझे लगा कि पिताजी के सम्मुख अपना दोष स्वीकार भी कर लेना चाहिए। पर जीभ न खुली। पिताजी स्वयं मुझे पीटेंगे, इसका डर तो था ही नहीं। मुझे याद नहीं पड़ा कि उन्होंने कभी हममें से किसी भाई को पीटा हो। पर खुद दुखी होंगे, शायद सिर फोड़ लें। मैने सोचा कि यह जोखिम उठाकर भी दोष कबूल कर ही लेना चाहिए, उसके बिना शुद्धि नहीं होगी। आखिर मैंने तय किया कि चिट्ठी लिखकर दोष स्वीकार किया जाए और क्षमा मांग ली जाए। मैंने चिट्ठी लिखकर हाथों हाथ दी। चिट्ठी में सारा दोष स्वीकार किया और सजा चाही। आग्रहपूर्वक बिनती की कि वे अपने को दु:ख में न डालें और भविष्य में फिर ऐसा अपराध न करने की प्रतिज्ञा की। मैने कांपते हाथों चिट्ठी पिताजी के हाथ में दी। मैं उनके तख्त के सामने बैठ गया। उन्होंने चिट्ठी पढ़ी। आंखों से मोती की बूंदें टपकीं। चिट्ठी भीग गई। उन्होंने क्षण भर के लिए आंखें मूंदी, चिट्ठी फाड़ डाली और स्वयं पढ़ने के लिए उठ बैठे थे सो वापस लेट गए। मैं भी रोया। पिताजी का दु:ख समझ सका। मोती की बूंदों के उस प्रेम बाण ने मुझे बेध डाला। मैं शुद्ध बना। इस प्रेम को तो अनुभवी ही जान सकता है। मेरे लिए यह अहिंसा का पदार्थपाठ था। उस समय तो मैंने इसमें पिता के प्रेम के सिवा और कुछ नहीं देखा, पर आज मैं इसे शुद्ध अहिंसा के नाम से पहचान सकता हूं। ऐसी अहिंसा के व्यापक रूप धारण कर लेने पर उसके स्पर्श से कौन बच सकता है? ऐसी व्यापक अहिंसा की शक्ति की थाह लेना असंभव है।
2
जाति से किया बाहर : बापू आज सिर्फ देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के हैं मगर एक समय ऐसा आया जब विदेश में अध्ययन के लिए जाने के कारण उन्हें अपनी ही जाति से बाहर कर दिया गया। बापू ने इसमें भी सार्थकता ढूंढ ली।
माता जी की आज्ञा और आशीर्वाद लेकर और पत्नी की गोद में कुछ महीनों का बालक छोड़कर में उमंगों के साथ बंबई पहुंचा। वहां पर समुद्री यात्रा के माध्यम से विलायत जाने की तैयारी चल रही थी। इस बीच जाति में खलबली मची। जाति की सभा बुलाई गई। अभी तक कोई मोढ़ बनिया विलायत नहीं गया था और मैं जा रहा हूं, इसलिए मुझसे जवाब तलब किया जाना चाहिए। मुझे पंचायत में जाहिर होने का हुक्म मिला। मैं गया। मैं नहीं जानता कि मुझमें अचानक हिम्मत कहां से आ गई। हाजिर रहने में मुझे न तो संकोच हुआ न डर लगा। जाति के सरपंच के साथ दूर का रिश्ता भी था। पिताजी के साथ उनका संबंध अच्छा था। उन्होंने मुझसे कहा, जाति का ख्याल है कि तूने विलायत जाने का विचार किया है वह ठीक नहीं है। हमारे धर्म में समुद्र पार करने की की मनाही है, तिस पर यह भी सुना जाता है कि वहां धर्म की रक्षा नहीं हो पाती। साहब लोगों के साथ खाना-पीना पड़ता है। मैंने जवाब दिया, मुझे तो लगता है कि विलायत जाने में लेशमात्र भी अधर्म नहीं है। मुझे तो वहां जाकर विद्याध्ययन ही करना है। फिर जिन बातों का आपको डर है, उनसे दूर रहने की प्रतिज्ञा मैंने अपनी माता जी के सम्मुख ली है, इसलिए मैं उनसे दूर रह सकूंगा। बहस के बाद मै भी अपने निर्णय पर अडिग था। अत: सरपंच ने आदेश दिया, यह लड़का आज से जातिच्युत माना जाएगा। जो कोई इसकी मदद करेगा अथवा इसे विदा करने जाएगा, पंच उससे जवाब तलग करेंगे और उससे सवा रुपया दण्ड का लिया जाएगा। जब में विलायत से लौटा तब भी जाति का झगड़ा मौजूद ही था। उसमें दो तड़ें पड़ गई थीं। एक पक्ष ने मुझे तुरंत जाति में ले लिया। दूसरा पक्ष न लेने पर डटा रहा। जाति में लेने वाले पक्ष को संतुष्ट करने के लिए राजकोट ले जाने से पहले भाई मुझे नासिक ले गए। वहां गंगा स्नान कराया और राजकोट पहुंचने पर जातिभोज दिया। भाई की इच्छाओं को आदेश मानकर मशीन की तरह उनकी इच्छा का अनुसरण करता रहा। जाति की जिस तड़ से मैं बहिष्कृत रहा, उसमें प्रवेश करने का प्रयत्न मैंने कभी नहीं किया, न मैंने जाति के किसी मुखिया के प्रति मन में कोई रोष रखा। जाति के बहिष्कार संबंधी कानून का मैं संपूर्ण आदर करता था। अपने सास-ससुर या बहन के घर मैं पानी तक न पीता था। मेरे इस व्यवहार का परिणाम यह हुआ कि जाति की ओर से मुझे कभी कोई कष्ट नहीं दिया गया। यही नहीं, बल्कि आज तक मैं जाति के एक विभाग में विधिवत् बहिष्कृत माना जाता हूं। फिर भी उनकी ओर से मैने सम्मान और उदारता का ही अनुभव किया है। उन्होंने मेरे कार्य में मुझे मदद भी दी है और मुझसे यह आशा तक नहीं रखी कि जाति के लिए मैं कुछ न कुछ करूं। मैं मानता हूं कि यदि मैंने जाति में सम्मिलित होने की खटपट की होती, उन्हें चिढ़ाया होता तो वे अवश्य मेरा विरोध करते और मैं इसमें फंसकर रह जाता।
3
रंगभेद से पहली बार सामना : बापू ने अपने जीवन का एक लंबा समय दक्षिण अफ्रीका में बिताया और मोहन दास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी वह दक्षिण अफ्रीका से बनकर ही लौटे थे। वहां रहने वाले हिंदूस्तानी और अश्वेत लोगों के लिए संघर्ष की लंबी लड़ाई लड़ने वाले बापू का वहां जाने से पहले कभी रंगद्वेष से कोई परिचय नहीं था।
ट्रेन लगभग 9 बजे नेटाल की राजधानी मेरित्सवर्ग पहुंची। यहां बिस्तर दिया जाता था। रेल्वे के किसी नौकर ने आकर पूछा, आपको बिस्तर की जरूरत है? मैंने कहा मेरे पास अपना बिस्तर है। वह चला गया इसी बीच एक यात्री आया। उसने मेरी तरफ देखा। मुझे भिन्न वर्ण का पाकर वह परेशान हुआ, बाहर निकला और एक-दो अफसरों को लेकर आया। किसी ने मुझे कुछ न कहा। आखिर एक अफसर आया। उसने कहा, इधर आओ, तुम्हें आखिरी डिब्बे में जाना है। मैंने कहा, मेरे पास पहले दर्जे का टिकट है। उसने जवाब दिया, इसकी कोई बात नहीं। मैं तुमसे कहता हूं कि तुम्हें आखिरी डिब्बे में जाना है। मैं कहता हूं कि मुझे इस डिब्बे में डरबन से बैठाया गया है और इसी में जाने का इरादा रखता हूं। अफसर ने कहा, यह नहीं हो सकता, तुमहें उतरना पड़ेगा और न उतरे तो सिपाही उतारेगा। मैंने कहा तो सिपाही भले उतारे, मैं खुद तो नहीं उतरूंगा। सिपाही आया उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे धक्का देकर नीचे उतारा। मेरा सामान उतार लिया। मैंने दूसरे डिब्बे में जाने से इंकार कर दिया। ट्रेन चल दी। तेज ठंड में थी और वेटिंग रूम के उस कमरे में दीया तक न था। मैंने अपने धर्म का विचार किया, या तो मुझे अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए या लौट जाना चाहिए,नहीं तो जो अपमान हो उन्हें सहकर प्रिटोरिया पहुंचना चाहिए और मुकदमा खत्म करके देश लौट जाना चाहिए। मुकदमा अधूरा छोड़कर भागना तो नामर्दी होगी। मुझे जो कष्ट सहना पड़ा है, सो तो ऊपरी कष्ट है। वह गहराई तक पैठे हुए महारोग का लक्षण है। यह महारोग है रंगद्वेष। यदि मुझमें इस गहरे रोग को मिटाने की शक्ति हो, तो उस महाशक्ति का उपयोग मुझे करना चाहिए। ऐसा करते हुए स्वयं जो कष्ट सहने पड़े सो सब सहने चाहिए औश्र उनका विरोध रंग-द्वेष मिटानेी की दृष्टि से ही करना चाहिए।
4
बड़ी कसौटी में मिली धीरज की सीख : : भारत में जातिगत भेद और छुआछूत की जड़े़ कितनी हैं। उसे बापू भी जानते थे और उन्होंने हर कदम पर उसे दूर करने के लिए पूरी दृढ़ता के साथ सामना किया, एक बार तो ऐसी स्थिति में बापू आश्रम छोड़कर जाने वाले थे...
आश्रम को कायम हुए अभी कुछ ही महीने बीते थे कि इतने में जैसी कसौटी की मुझे आशा नहीं थी, वैसी कसौटी हमारी हुई। भाई अमृतलाल ठक्कर का पत्र मिला : एक गरीब और प्रमाणिक अन्त्यज परिवार है। वह आपके आश्रम में रहना चाहता है। क्या उसे भर्ती करेंगे? मैं चौंका। ठक्करबापा जैसे पुरुष की सिफारिश लेकर कोई अन्त्यज परिवार इतनी जल्दी आएगा, इसकी मुझे जरा भी आशा न थी। मैंने साथियों को वह पत्र पढ़ने के लिए दिया। उन्होंने इसका स्वागत किया। भाई अमृतलाल ठक्कर को लिखा गया कि यदि वह परिवार आश्रम के नियमों का पालन करने को तैयार हो, तो हम उसे भर्ती करने के लिए तैयार हैं।
दूदाभाई, उनकी पत्नी दानी बहन और दूध-पीती तथा घुटनों चलती बच्ची लक्ष्मी तीनों आए। दूदाभाई बंबई में शिक्षक का काम करते थे। नियमों का पालन करने को वे तैयार थे। उन्हें आश्रम में रख लिया। साथियों में खलबली मच गई। जिस कुएं मं बंगले के मालिक का हिस्सा था, उस कुंए से पानी भरने में हमें अड़चन होने लगी। उनके पानी भरनेवाले पर हमारे पानी के छींटे पड़ जाते, तो वह भ्रष्ट हो जाता। उसने गालियां देना और दूदाभाई को सताना शुरू किया। मैंने सबसे कह दिया कि गालियां सहते जाओ और दृढ़तापूर्वक पानी भरते रहो। हमें चुपचाप गालियां सुनते देखकर वह कर्मचारी शर्मिंदा हुआ और उसने गालियां देना बंद कर दिया। पर पैसे की मदद बंद हो गई। पैसे की मदद बंद होने के साथ बहिष्कार की अफवाहें मेरे कानों तक आने लगीं। मैंने साथियों से चर्चा करके तय कर रखा था 'यदि हमारा बहिष्कार किया जाए और हमें कहीं से कोई मदद न मिले तो भी अब हम अहमदाबाद नहीं छोड़ेंगे। अन्त्यजों की बस्ती में जाकर उनके साथ रहेंगे और जो कुछ मिलेगा उससे अथवा मजदूरी करके अपना निर्वाह करेंगे।' आखिर मगनलाल ने मुझे नोटिस दी - 'अगले महीने आश्रम का खर्च चलाने के लिए हमारे पास पैसे नहीं हैं।' मैंने धीरज से जवाब दिया : 'तो हम अन्त्यजों की बस्ती में रहने जाएंगे।' मुझ पर ऐसा संकट पहली बार नहीं आया था । हर बार अंतिम घड़ी में प्रभु ने मदद भेजी है। मगनलाल के नोटिस देने के बाद तुरंत ही एक दिन सवेरे किसी लड़के ने आकर खबर दी : 'बाहर मोटर खड़ी है और एक सेठ आपको बुला रहे हैं' मैं मोटर के पास गया। सेठ ने मुझसे पूछा : 'मेरी इच्छा आश्रम को कुछ मदद देने की है, आप लेंगे। मैंने जवाब दिया : 'अगर आप कुछ देंगे, तो मैं जरूर लूंगा। मुझे कबूल करना चाहिए कि इस समय मैं आर्थिक संकट में भी हूं।' ' मैं कल इसी समय आऊंगा। तब आप आश्रम में होंगे?' मैंने हां कहा और सेठ चले गए। दूसरे दिन नियत समय पर मोटर का भोंपू बोला। लड़कों ने खबर दी। सेठ अंदर नहीं आए। मैं उनसे मिलने गया। वे मेरे हाथ पर तेरह हजार के नोट रखकर बिदा हो गए। मैंने इस मदद की कभी आशा नहीं रखी थी। मदद देने की यह रीति भी नई देखी। उन्होंने आश्रम में पहले कभी कदम नहीं रखा था। मुझे याद आता है कि मैं उनसे एक ही बार मिला था। न आश्रम में आना, न कुछ पूछना, बाहर ही बाहर पैसे देकर लौट जाना, ऐसा यह मेरा पहला ही अनुभव था। इस सहायता के कारण अन्त्यजों की बस्ती में जाना रुक गया। मुझे लगभग एक साल का खर्च मिल गया। हालांकि बाहर की तरह आश्रम के अंदर भी खलबली थी। मेरी पत्नी और आश्रम की अन्य स्त्रियों को यह पसंद न आया। दानी बहन के प्रति घृणा और उदासीनता ऐसी थी, जिसे मेरी अत्यंत सूक्ष्म आंखें देख लेती थीं और तेज कान सुन लेते थे। आर्थिक सहायता के अभाव के डर ने मुझे जरा भी चिन्तित नहीं किया था। पर यह आंतरिक क्षोभ कठिन सिद्ध हुआ। दानीबहन साधारण स्त्री थी। दूदाभाई की शिक्षा भी साधारण थी, पर उनकी बुद्धि अच्छी थी उनका धीरज मुझे पसंद आया था। उन्हें कभी-कभी गुस्सा आता था, पर कुल मिलाकर उनकी सहन शक्ति की मुझ पर अच्छी छाप पड़ी थी। मैं दूदाभाई को समझाता था कि वे छोटे-मोटे अपमान पी लिया करें। वे समझ जाते थे और दानीबहन से भी सहन करवाते थे। इस परिवार को आश्रम में रखकर बहुतेरे पाठ सीखे हैं और आरंभिक काल में ही इस बात के बिल्कुल स्पष्ट हो जाने से कि आश्रम में अस्पृश्यता के लिए कोई स्थान नहीं है, मर्यादा निश्चित हो गई और इस दिशा में काम सरल हो गया।
5
जब जाना सादगी और स्वाबलंब का अर्थ : महात्मा गांधी ने जीवन सादगी से जिया खादी की स्वदेशी धोती और सूत कातकर चरखे से बनी चादर ही उनका पहनावा था। स्वावलंबन को महत्व देने वाले बापू ने दक्षिण अफ्रीका में जब गोरे नाई ने उनके बाल काटने से इंकार किया तब उन्होंने सादगी और स्वाबलंबन का न केवल महत्व जाना बल्कि उनके सामने भारतीय जातिय भेदभाव के दृश्य भी उभरे
भोग भोगना मैंने शुरू तो किया, पर वह टिक न सका। घर के लिए साज-सामान भी बसाया, पर मेरे मन में उसके प्रति कभी मोह उत्पन्न नहीं हो सका। इसलिए घर बसाने के साथ ही मैंने खर्च कम करना शुरू कर दिया। धोबी का खर्च भी ज्यादा मालुम हुआ। इसके अलावा, धोबी निश्चित समय पर कपड़े नहीं लौटाता था। इसलिए दो-तीन दर्जन कमीजों और उतने ही कालरों से भी मेरा काम चल नहीं पाता था। कालर में रोज बदलता था। कमीज रोज नहीं तो एक दिन के अंतर से बदलता था। इससे दोहरा खर्च होता था। मुझे यह व्यर्थ प्रतीत हुआ। अतएव मैंने धुलाई का सामान जुटाया। धुलाई-कला पर पुस्तक पढ़ी और कपड़े धोना सीखा। पत्नी को भी सिखाया। काम का कुछ बोझ तो बढ़ा ही, पर नया काम होने से उसे करने में आनंद आता था। पहली बार अपने हाथों से धोए हुए कॉलर को तो मैं कभी भूल नहीं सकता। उसमें कलफ अधिक लग गया था और इस्तरी पूरी गरम नहीं थी। तिस पर कालर के जल जाने के डर से इस्तरी को मैंने अच्छी तरह दबाया भी नहीं था। इससे कॉलर में कड़ापन तो आ गया, पर उसमें से कलफ झड़ता रहा। ऐसी हालत में मैं कोर्ट गया और वहां बारिस्टरों के लिए मजाक का साधन बन गया। पर इस तरह का मजाक सह लेने की शक्ति उस समय भी मुझ में काफी थी। मैंने सफाई देते हुए कहा, अपने हाथों कालर धोने का मेरा यह पहला प्रयोग है, इस कारण इसमें से कलफ झड़ता है। मुझे इससे कोई अड़चन नहीं होती, तिस पर आप सब लोगों के लिए विनोद की इतनी सामग्री जुटा रहा हूं, सो अलग से।
एक मित्र ने पूछा, 'पर क्या धोबियों का अकाल पड़ गया है? ' यहां धोबियों का खर्च तो मुझे असह्या मालूम होता है। कालर की कीमत के बराबर धुलाई हो जाती है और इतनी धुलाई देने के बाद भी धोबी की गुलामी करनी पड़ती है। इसकी अपेक्षा कपड़े अपने हाथ से धोना में ज्यादा पसंद करता हूं। स्वावलंबंन की यह खूबी मैं मित्रों को समझा नहीं सका।
मुझे कहना चाहिए कि आखिर धोबी के धंधे में अपने काम लायक कुशलता मैंने प्राप्त कर ली थी और घर की धुलाई धोबी की धुलाई से जरा भी घटिया नहीं होती थी। कालर का कड़ापन और चमक धोबी के धोये कालर से कम न रहती थी। गोखले के पास स्व. महादेव गोविंद रानाडे की प्रसादी-रूप एक दुपट्टा था। गोखले उस दुपट्टे को अतिशय जतन से रखते थे और विषय अवसर पर ही उसका उपयोग करते थे। जोहानिस्बर्ग में उनके सम्मान में जो भोज दिया गया था, वह एक महत्वपूर्ण अवसर था। उस अवसर पर उन्होंने जो भाषण दिया वह दक्षिण अफ्रीका में उनका बड़े-से-बड़ा भाषण था। अतएव उस अवसर पर उन्हें उक्त दुपट्टे का प्रयोग करना था। उसमें सिलवटें पड़ी हुई थीं और उस पर इस्तरी करने की जरूरत थी। धोबी का पता लगाकरउससे तुरंत इस्तरी कराना संभव न था। मैंने अपनी कला का उपयोग करने देने की अनुमति गोखले से चाही। ' मैं तुम्हारी वकालत का तो विश्वास कर लूंगा, पर इस दुपट्टे पर तुम्हें अपनी धोबी-कला का उपयोग नहीं करने दूंगा। इस दुपट्टे पर तुम दाग लगा दो तो? इसकी कीमत तुम जानते हो? यों कहकर अत्यंत उल्लास से उन्होंने प्रसादी की कथा मुझे सुनायी। मैंने फिर विनती की और दाग न पड़ने देने की जिम्मेदारी ली। मुझे इस्तरी करने की अनुमति मिली और अपनी कुशलता का प्रमाण पत्र मुझे मिल गया। अब दुनिया मुझे प्रमाण-पत्र न दे तो भी क्या?
जिस तरह मैं धोबी की गुलामी से छूटा, उसी तरह नाई की गुलामी से भी छूटने का अवसर आ गया। हजामत तो विलायत जानेवाले सब कोई हाथ से बनाना सीख ही लेते हैं, पर कोई बाल छांटना भी सीखता होगा, इसका मुझे ख्याल नहीं है। एक बार प्रिटोरिया में मैं एक अंग्रेज हज्जाम की दुकान पर पहुंचा। उसने मेरी हजामत बनाने से साफ इंकार कर दिया और इंकार करते हुए जो तिरस्कार प्रकट किया, सो अलग से। मुझे दु:ख हुआ। मैं बाजार पहुंचा। मैंने बाल काटने की मशीन खरीदी और आईने के सामने खड़े रहकर बाल काटे। बाल जैसे-तैसे कट तो गए, पर पीछे के बाल काटने में बड़ी कठिनाई हुई। सीधे तो वे कट ही न पाए। कोर्ट में खूब कहकहे लगे। ' तुम्हारे बाल ऐसे क्यों हो गए हैं? सिर पर चूहे तो नहीं चढ़ गए थे? '
मैंने कहा : ' जी नहीं, मेरे काले सिर को गोरा हज्जाम कैसे छू सकता है? इसलिए कैसे भी क्यों न हों, अपने हाथ से काटे हुए बाल मुझे अधिक प्रिय हैं। ' इस उत्तर से मित्रों को आश्चचर्य नहीं हुआ। असल में उस हज्जाम का कोई दोष न था। अगर वह काली चमड़ीवालों के बाल काटने लगता तो उसकी रोजी मारी जाती। हम भी अपने अछूतों के बाल ऊंची जाति के हिंदुओं हज्जामों को कहां काटने देते हैं? दक्षिण अफ्रीका में मुझे इसका बदला एक नहीं अनेक बार मिला है, और चूंकि मैं यह मानता था कि यह हमारे दोष का परिणाम है, इसलिए मुझे इस बात से कभी गुस्सा नहीं आया। स्वावलंबन और सादगी के मेरे शौक ने आगे चलकर जो तीव्र स्वरूप धारण किया, उसका वर्णन यथास्थान होगा। इस चीज की जड़ तो मेरे अंदर शुरू से ही थी। उसके फूलने-फलने के लिए केवल सिंचाई की आवश्यकता थी। वह सिंचाई अनायास ही मिल गई।
बापू से इन्होंने भी ली प्रेरणा
2 अक्टूबर 1869 को जन्में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को करोड़ों लोग अपनी प्रेरणा मानते हैं, फिर चाहे वह देश में हों या परदेश में। अपने या अपने समाज के लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले हर शख्स के लिए बापू का जीवन प्रेरणा का अद्वितीय उदाहरण है। अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा से एक इंटरव्यू में जब पूछा गया कि वह किस जीवित या मृत व्यक्ति के साथ डिनर करने की चाह रखते हैं तो उनका जवाब महात्मा गांधी था। अमेरिका में सिविल राइट्स मूवमेंट चलाने वाले और अफ्रीकी अमेरिकी करोड़ों लोगों के आदर्श और उनके लिए अहिंसात्मक आंदोलन चलाने वाले मार्टिन लूथर किंग का व्यक्तित्व भी महात्मा गांधी से प्रभावित था। वह कहा करते थे ईसा मसीह ने हमको लक्ष्य और महात्मा गांधी ने रणनीति दी है। दुनिया के जीनियस माइंड अल्बर्ट आइंस्टाइन ने तो बापू के बारे में कहा था
संदर्भ ग्रंथ : सत्य के प्रयोग - मोहनदास करमचंद गांधी
प्रस्तुति सर्जना चतुर्वेदी
कि आने वाली पीढ़ियां शायद ही इस बात पर यकीन करेंगी कि कभी पृथ्वी पर ऐसा हाड़-मांस का पुतला भी चला था। दक्षिण अफ्रीकी गांधी के नाम से मशहूर नेल्सन मंडेला की भले ही बापू से कभी मुलाकात न हुई हो मगर बापू की शिक्षा हमेशा उनके 27 साल के जेल के अंधेरे जीवन में रोशनी का काम करती रही।
1
बीड़ी के ठूंठ चुराने और इसी सिलसिले में नौकर के पैसे चुराने के दोष की तुलना में मुझसे चोरी का दूसरा जो दोष हुआ, उसे मैं अधिक गंभीर मानता हूं। इस चोरी के समय मेरी उम्र पंद्रह साल की रही होगी। यह चोरी मेरे मांसाहारी भाई के सोने के टुकड़े की थी। उन पर मामूली-सा, लगभग 25 रुपए का, कर्ज हो गया था। उसकी अदायगी के बारे में हम दोनों भाई सोच रहे थे। मेरे भाई के हाथ में सोने का ठोस का कड़ा था, उसमें से एक तोला सोना काट लेना मुश्किल न था। कड़ा कटा। कर्ज अदा हुआ। पर मेरे लिए यह बात असह्य हो गई। मैंने निश्चय किया कि आगे कभी चोरी करूंगा ही नहीं। मुझे लगा कि पिताजी के सम्मुख अपना दोष स्वीकार भी कर लेना चाहिए। पर जीभ न खुली। पिताजी स्वयं मुझे पीटेंगे, इसका डर तो था ही नहीं। मुझे याद नहीं पड़ा कि उन्होंने कभी हममें से किसी भाई को पीटा हो। पर खुद दुखी होंगे, शायद सिर फोड़ लें। मैने सोचा कि यह जोखिम उठाकर भी दोष कबूल कर ही लेना चाहिए, उसके बिना शुद्धि नहीं होगी। आखिर मैंने तय किया कि चिट्ठी लिखकर दोष स्वीकार किया जाए और क्षमा मांग ली जाए। मैंने चिट्ठी लिखकर हाथों हाथ दी। चिट्ठी में सारा दोष स्वीकार किया और सजा चाही। आग्रहपूर्वक बिनती की कि वे अपने को दु:ख में न डालें और भविष्य में फिर ऐसा अपराध न करने की प्रतिज्ञा की। मैने कांपते हाथों चिट्ठी पिताजी के हाथ में दी। मैं उनके तख्त के सामने बैठ गया। उन्होंने चिट्ठी पढ़ी। आंखों से मोती की बूंदें टपकीं। चिट्ठी भीग गई। उन्होंने क्षण भर के लिए आंखें मूंदी, चिट्ठी फाड़ डाली और स्वयं पढ़ने के लिए उठ बैठे थे सो वापस लेट गए। मैं भी रोया। पिताजी का दु:ख समझ सका। मोती की बूंदों के उस प्रेम बाण ने मुझे बेध डाला। मैं शुद्ध बना। इस प्रेम को तो अनुभवी ही जान सकता है। मेरे लिए यह अहिंसा का पदार्थपाठ था। उस समय तो मैंने इसमें पिता के प्रेम के सिवा और कुछ नहीं देखा, पर आज मैं इसे शुद्ध अहिंसा के नाम से पहचान सकता हूं। ऐसी अहिंसा के व्यापक रूप धारण कर लेने पर उसके स्पर्श से कौन बच सकता है? ऐसी व्यापक अहिंसा की शक्ति की थाह लेना असंभव है।
2
जाति से किया बाहर : बापू आज सिर्फ देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के हैं मगर एक समय ऐसा आया जब विदेश में अध्ययन के लिए जाने के कारण उन्हें अपनी ही जाति से बाहर कर दिया गया। बापू ने इसमें भी सार्थकता ढूंढ ली।
माता जी की आज्ञा और आशीर्वाद लेकर और पत्नी की गोद में कुछ महीनों का बालक छोड़कर में उमंगों के साथ बंबई पहुंचा। वहां पर समुद्री यात्रा के माध्यम से विलायत जाने की तैयारी चल रही थी। इस बीच जाति में खलबली मची। जाति की सभा बुलाई गई। अभी तक कोई मोढ़ बनिया विलायत नहीं गया था और मैं जा रहा हूं, इसलिए मुझसे जवाब तलब किया जाना चाहिए। मुझे पंचायत में जाहिर होने का हुक्म मिला। मैं गया। मैं नहीं जानता कि मुझमें अचानक हिम्मत कहां से आ गई। हाजिर रहने में मुझे न तो संकोच हुआ न डर लगा। जाति के सरपंच के साथ दूर का रिश्ता भी था। पिताजी के साथ उनका संबंध अच्छा था। उन्होंने मुझसे कहा, जाति का ख्याल है कि तूने विलायत जाने का विचार किया है वह ठीक नहीं है। हमारे धर्म में समुद्र पार करने की की मनाही है, तिस पर यह भी सुना जाता है कि वहां धर्म की रक्षा नहीं हो पाती। साहब लोगों के साथ खाना-पीना पड़ता है। मैंने जवाब दिया, मुझे तो लगता है कि विलायत जाने में लेशमात्र भी अधर्म नहीं है। मुझे तो वहां जाकर विद्याध्ययन ही करना है। फिर जिन बातों का आपको डर है, उनसे दूर रहने की प्रतिज्ञा मैंने अपनी माता जी के सम्मुख ली है, इसलिए मैं उनसे दूर रह सकूंगा। बहस के बाद मै भी अपने निर्णय पर अडिग था। अत: सरपंच ने आदेश दिया, यह लड़का आज से जातिच्युत माना जाएगा। जो कोई इसकी मदद करेगा अथवा इसे विदा करने जाएगा, पंच उससे जवाब तलग करेंगे और उससे सवा रुपया दण्ड का लिया जाएगा। जब में विलायत से लौटा तब भी जाति का झगड़ा मौजूद ही था। उसमें दो तड़ें पड़ गई थीं। एक पक्ष ने मुझे तुरंत जाति में ले लिया। दूसरा पक्ष न लेने पर डटा रहा। जाति में लेने वाले पक्ष को संतुष्ट करने के लिए राजकोट ले जाने से पहले भाई मुझे नासिक ले गए। वहां गंगा स्नान कराया और राजकोट पहुंचने पर जातिभोज दिया। भाई की इच्छाओं को आदेश मानकर मशीन की तरह उनकी इच्छा का अनुसरण करता रहा। जाति की जिस तड़ से मैं बहिष्कृत रहा, उसमें प्रवेश करने का प्रयत्न मैंने कभी नहीं किया, न मैंने जाति के किसी मुखिया के प्रति मन में कोई रोष रखा। जाति के बहिष्कार संबंधी कानून का मैं संपूर्ण आदर करता था। अपने सास-ससुर या बहन के घर मैं पानी तक न पीता था। मेरे इस व्यवहार का परिणाम यह हुआ कि जाति की ओर से मुझे कभी कोई कष्ट नहीं दिया गया। यही नहीं, बल्कि आज तक मैं जाति के एक विभाग में विधिवत् बहिष्कृत माना जाता हूं। फिर भी उनकी ओर से मैने सम्मान और उदारता का ही अनुभव किया है। उन्होंने मेरे कार्य में मुझे मदद भी दी है और मुझसे यह आशा तक नहीं रखी कि जाति के लिए मैं कुछ न कुछ करूं। मैं मानता हूं कि यदि मैंने जाति में सम्मिलित होने की खटपट की होती, उन्हें चिढ़ाया होता तो वे अवश्य मेरा विरोध करते और मैं इसमें फंसकर रह जाता।
3
रंगभेद से पहली बार सामना : बापू ने अपने जीवन का एक लंबा समय दक्षिण अफ्रीका में बिताया और मोहन दास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी वह दक्षिण अफ्रीका से बनकर ही लौटे थे। वहां रहने वाले हिंदूस्तानी और अश्वेत लोगों के लिए संघर्ष की लंबी लड़ाई लड़ने वाले बापू का वहां जाने से पहले कभी रंगद्वेष से कोई परिचय नहीं था।
ट्रेन लगभग 9 बजे नेटाल की राजधानी मेरित्सवर्ग पहुंची। यहां बिस्तर दिया जाता था। रेल्वे के किसी नौकर ने आकर पूछा, आपको बिस्तर की जरूरत है? मैंने कहा मेरे पास अपना बिस्तर है। वह चला गया इसी बीच एक यात्री आया। उसने मेरी तरफ देखा। मुझे भिन्न वर्ण का पाकर वह परेशान हुआ, बाहर निकला और एक-दो अफसरों को लेकर आया। किसी ने मुझे कुछ न कहा। आखिर एक अफसर आया। उसने कहा, इधर आओ, तुम्हें आखिरी डिब्बे में जाना है। मैंने कहा, मेरे पास पहले दर्जे का टिकट है। उसने जवाब दिया, इसकी कोई बात नहीं। मैं तुमसे कहता हूं कि तुम्हें आखिरी डिब्बे में जाना है। मैं कहता हूं कि मुझे इस डिब्बे में डरबन से बैठाया गया है और इसी में जाने का इरादा रखता हूं। अफसर ने कहा, यह नहीं हो सकता, तुमहें उतरना पड़ेगा और न उतरे तो सिपाही उतारेगा। मैंने कहा तो सिपाही भले उतारे, मैं खुद तो नहीं उतरूंगा। सिपाही आया उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे धक्का देकर नीचे उतारा। मेरा सामान उतार लिया। मैंने दूसरे डिब्बे में जाने से इंकार कर दिया। ट्रेन चल दी। तेज ठंड में थी और वेटिंग रूम के उस कमरे में दीया तक न था। मैंने अपने धर्म का विचार किया, या तो मुझे अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए या लौट जाना चाहिए,नहीं तो जो अपमान हो उन्हें सहकर प्रिटोरिया पहुंचना चाहिए और मुकदमा खत्म करके देश लौट जाना चाहिए। मुकदमा अधूरा छोड़कर भागना तो नामर्दी होगी। मुझे जो कष्ट सहना पड़ा है, सो तो ऊपरी कष्ट है। वह गहराई तक पैठे हुए महारोग का लक्षण है। यह महारोग है रंगद्वेष। यदि मुझमें इस गहरे रोग को मिटाने की शक्ति हो, तो उस महाशक्ति का उपयोग मुझे करना चाहिए। ऐसा करते हुए स्वयं जो कष्ट सहने पड़े सो सब सहने चाहिए औश्र उनका विरोध रंग-द्वेष मिटानेी की दृष्टि से ही करना चाहिए।
4
बड़ी कसौटी में मिली धीरज की सीख : : भारत में जातिगत भेद और छुआछूत की जड़े़ कितनी हैं। उसे बापू भी जानते थे और उन्होंने हर कदम पर उसे दूर करने के लिए पूरी दृढ़ता के साथ सामना किया, एक बार तो ऐसी स्थिति में बापू आश्रम छोड़कर जाने वाले थे...
आश्रम को कायम हुए अभी कुछ ही महीने बीते थे कि इतने में जैसी कसौटी की मुझे आशा नहीं थी, वैसी कसौटी हमारी हुई। भाई अमृतलाल ठक्कर का पत्र मिला : एक गरीब और प्रमाणिक अन्त्यज परिवार है। वह आपके आश्रम में रहना चाहता है। क्या उसे भर्ती करेंगे? मैं चौंका। ठक्करबापा जैसे पुरुष की सिफारिश लेकर कोई अन्त्यज परिवार इतनी जल्दी आएगा, इसकी मुझे जरा भी आशा न थी। मैंने साथियों को वह पत्र पढ़ने के लिए दिया। उन्होंने इसका स्वागत किया। भाई अमृतलाल ठक्कर को लिखा गया कि यदि वह परिवार आश्रम के नियमों का पालन करने को तैयार हो, तो हम उसे भर्ती करने के लिए तैयार हैं।
दूदाभाई, उनकी पत्नी दानी बहन और दूध-पीती तथा घुटनों चलती बच्ची लक्ष्मी तीनों आए। दूदाभाई बंबई में शिक्षक का काम करते थे। नियमों का पालन करने को वे तैयार थे। उन्हें आश्रम में रख लिया। साथियों में खलबली मच गई। जिस कुएं मं बंगले के मालिक का हिस्सा था, उस कुंए से पानी भरने में हमें अड़चन होने लगी। उनके पानी भरनेवाले पर हमारे पानी के छींटे पड़ जाते, तो वह भ्रष्ट हो जाता। उसने गालियां देना और दूदाभाई को सताना शुरू किया। मैंने सबसे कह दिया कि गालियां सहते जाओ और दृढ़तापूर्वक पानी भरते रहो। हमें चुपचाप गालियां सुनते देखकर वह कर्मचारी शर्मिंदा हुआ और उसने गालियां देना बंद कर दिया। पर पैसे की मदद बंद हो गई। पैसे की मदद बंद होने के साथ बहिष्कार की अफवाहें मेरे कानों तक आने लगीं। मैंने साथियों से चर्चा करके तय कर रखा था 'यदि हमारा बहिष्कार किया जाए और हमें कहीं से कोई मदद न मिले तो भी अब हम अहमदाबाद नहीं छोड़ेंगे। अन्त्यजों की बस्ती में जाकर उनके साथ रहेंगे और जो कुछ मिलेगा उससे अथवा मजदूरी करके अपना निर्वाह करेंगे।' आखिर मगनलाल ने मुझे नोटिस दी - 'अगले महीने आश्रम का खर्च चलाने के लिए हमारे पास पैसे नहीं हैं।' मैंने धीरज से जवाब दिया : 'तो हम अन्त्यजों की बस्ती में रहने जाएंगे।' मुझ पर ऐसा संकट पहली बार नहीं आया था । हर बार अंतिम घड़ी में प्रभु ने मदद भेजी है। मगनलाल के नोटिस देने के बाद तुरंत ही एक दिन सवेरे किसी लड़के ने आकर खबर दी : 'बाहर मोटर खड़ी है और एक सेठ आपको बुला रहे हैं' मैं मोटर के पास गया। सेठ ने मुझसे पूछा : 'मेरी इच्छा आश्रम को कुछ मदद देने की है, आप लेंगे। मैंने जवाब दिया : 'अगर आप कुछ देंगे, तो मैं जरूर लूंगा। मुझे कबूल करना चाहिए कि इस समय मैं आर्थिक संकट में भी हूं।' ' मैं कल इसी समय आऊंगा। तब आप आश्रम में होंगे?' मैंने हां कहा और सेठ चले गए। दूसरे दिन नियत समय पर मोटर का भोंपू बोला। लड़कों ने खबर दी। सेठ अंदर नहीं आए। मैं उनसे मिलने गया। वे मेरे हाथ पर तेरह हजार के नोट रखकर बिदा हो गए। मैंने इस मदद की कभी आशा नहीं रखी थी। मदद देने की यह रीति भी नई देखी। उन्होंने आश्रम में पहले कभी कदम नहीं रखा था। मुझे याद आता है कि मैं उनसे एक ही बार मिला था। न आश्रम में आना, न कुछ पूछना, बाहर ही बाहर पैसे देकर लौट जाना, ऐसा यह मेरा पहला ही अनुभव था। इस सहायता के कारण अन्त्यजों की बस्ती में जाना रुक गया। मुझे लगभग एक साल का खर्च मिल गया। हालांकि बाहर की तरह आश्रम के अंदर भी खलबली थी। मेरी पत्नी और आश्रम की अन्य स्त्रियों को यह पसंद न आया। दानी बहन के प्रति घृणा और उदासीनता ऐसी थी, जिसे मेरी अत्यंत सूक्ष्म आंखें देख लेती थीं और तेज कान सुन लेते थे। आर्थिक सहायता के अभाव के डर ने मुझे जरा भी चिन्तित नहीं किया था। पर यह आंतरिक क्षोभ कठिन सिद्ध हुआ। दानीबहन साधारण स्त्री थी। दूदाभाई की शिक्षा भी साधारण थी, पर उनकी बुद्धि अच्छी थी उनका धीरज मुझे पसंद आया था। उन्हें कभी-कभी गुस्सा आता था, पर कुल मिलाकर उनकी सहन शक्ति की मुझ पर अच्छी छाप पड़ी थी। मैं दूदाभाई को समझाता था कि वे छोटे-मोटे अपमान पी लिया करें। वे समझ जाते थे और दानीबहन से भी सहन करवाते थे। इस परिवार को आश्रम में रखकर बहुतेरे पाठ सीखे हैं और आरंभिक काल में ही इस बात के बिल्कुल स्पष्ट हो जाने से कि आश्रम में अस्पृश्यता के लिए कोई स्थान नहीं है, मर्यादा निश्चित हो गई और इस दिशा में काम सरल हो गया।
5
जब जाना सादगी और स्वाबलंब का अर्थ : महात्मा गांधी ने जीवन सादगी से जिया खादी की स्वदेशी धोती और सूत कातकर चरखे से बनी चादर ही उनका पहनावा था। स्वावलंबन को महत्व देने वाले बापू ने दक्षिण अफ्रीका में जब गोरे नाई ने उनके बाल काटने से इंकार किया तब उन्होंने सादगी और स्वाबलंबन का न केवल महत्व जाना बल्कि उनके सामने भारतीय जातिय भेदभाव के दृश्य भी उभरे
भोग भोगना मैंने शुरू तो किया, पर वह टिक न सका। घर के लिए साज-सामान भी बसाया, पर मेरे मन में उसके प्रति कभी मोह उत्पन्न नहीं हो सका। इसलिए घर बसाने के साथ ही मैंने खर्च कम करना शुरू कर दिया। धोबी का खर्च भी ज्यादा मालुम हुआ। इसके अलावा, धोबी निश्चित समय पर कपड़े नहीं लौटाता था। इसलिए दो-तीन दर्जन कमीजों और उतने ही कालरों से भी मेरा काम चल नहीं पाता था। कालर में रोज बदलता था। कमीज रोज नहीं तो एक दिन के अंतर से बदलता था। इससे दोहरा खर्च होता था। मुझे यह व्यर्थ प्रतीत हुआ। अतएव मैंने धुलाई का सामान जुटाया। धुलाई-कला पर पुस्तक पढ़ी और कपड़े धोना सीखा। पत्नी को भी सिखाया। काम का कुछ बोझ तो बढ़ा ही, पर नया काम होने से उसे करने में आनंद आता था। पहली बार अपने हाथों से धोए हुए कॉलर को तो मैं कभी भूल नहीं सकता। उसमें कलफ अधिक लग गया था और इस्तरी पूरी गरम नहीं थी। तिस पर कालर के जल जाने के डर से इस्तरी को मैंने अच्छी तरह दबाया भी नहीं था। इससे कॉलर में कड़ापन तो आ गया, पर उसमें से कलफ झड़ता रहा। ऐसी हालत में मैं कोर्ट गया और वहां बारिस्टरों के लिए मजाक का साधन बन गया। पर इस तरह का मजाक सह लेने की शक्ति उस समय भी मुझ में काफी थी। मैंने सफाई देते हुए कहा, अपने हाथों कालर धोने का मेरा यह पहला प्रयोग है, इस कारण इसमें से कलफ झड़ता है। मुझे इससे कोई अड़चन नहीं होती, तिस पर आप सब लोगों के लिए विनोद की इतनी सामग्री जुटा रहा हूं, सो अलग से।
एक मित्र ने पूछा, 'पर क्या धोबियों का अकाल पड़ गया है? ' यहां धोबियों का खर्च तो मुझे असह्या मालूम होता है। कालर की कीमत के बराबर धुलाई हो जाती है और इतनी धुलाई देने के बाद भी धोबी की गुलामी करनी पड़ती है। इसकी अपेक्षा कपड़े अपने हाथ से धोना में ज्यादा पसंद करता हूं। स्वावलंबंन की यह खूबी मैं मित्रों को समझा नहीं सका।
मुझे कहना चाहिए कि आखिर धोबी के धंधे में अपने काम लायक कुशलता मैंने प्राप्त कर ली थी और घर की धुलाई धोबी की धुलाई से जरा भी घटिया नहीं होती थी। कालर का कड़ापन और चमक धोबी के धोये कालर से कम न रहती थी। गोखले के पास स्व. महादेव गोविंद रानाडे की प्रसादी-रूप एक दुपट्टा था। गोखले उस दुपट्टे को अतिशय जतन से रखते थे और विषय अवसर पर ही उसका उपयोग करते थे। जोहानिस्बर्ग में उनके सम्मान में जो भोज दिया गया था, वह एक महत्वपूर्ण अवसर था। उस अवसर पर उन्होंने जो भाषण दिया वह दक्षिण अफ्रीका में उनका बड़े-से-बड़ा भाषण था। अतएव उस अवसर पर उन्हें उक्त दुपट्टे का प्रयोग करना था। उसमें सिलवटें पड़ी हुई थीं और उस पर इस्तरी करने की जरूरत थी। धोबी का पता लगाकरउससे तुरंत इस्तरी कराना संभव न था। मैंने अपनी कला का उपयोग करने देने की अनुमति गोखले से चाही। ' मैं तुम्हारी वकालत का तो विश्वास कर लूंगा, पर इस दुपट्टे पर तुम्हें अपनी धोबी-कला का उपयोग नहीं करने दूंगा। इस दुपट्टे पर तुम दाग लगा दो तो? इसकी कीमत तुम जानते हो? यों कहकर अत्यंत उल्लास से उन्होंने प्रसादी की कथा मुझे सुनायी। मैंने फिर विनती की और दाग न पड़ने देने की जिम्मेदारी ली। मुझे इस्तरी करने की अनुमति मिली और अपनी कुशलता का प्रमाण पत्र मुझे मिल गया। अब दुनिया मुझे प्रमाण-पत्र न दे तो भी क्या?
जिस तरह मैं धोबी की गुलामी से छूटा, उसी तरह नाई की गुलामी से भी छूटने का अवसर आ गया। हजामत तो विलायत जानेवाले सब कोई हाथ से बनाना सीख ही लेते हैं, पर कोई बाल छांटना भी सीखता होगा, इसका मुझे ख्याल नहीं है। एक बार प्रिटोरिया में मैं एक अंग्रेज हज्जाम की दुकान पर पहुंचा। उसने मेरी हजामत बनाने से साफ इंकार कर दिया और इंकार करते हुए जो तिरस्कार प्रकट किया, सो अलग से। मुझे दु:ख हुआ। मैं बाजार पहुंचा। मैंने बाल काटने की मशीन खरीदी और आईने के सामने खड़े रहकर बाल काटे। बाल जैसे-तैसे कट तो गए, पर पीछे के बाल काटने में बड़ी कठिनाई हुई। सीधे तो वे कट ही न पाए। कोर्ट में खूब कहकहे लगे। ' तुम्हारे बाल ऐसे क्यों हो गए हैं? सिर पर चूहे तो नहीं चढ़ गए थे? '
मैंने कहा : ' जी नहीं, मेरे काले सिर को गोरा हज्जाम कैसे छू सकता है? इसलिए कैसे भी क्यों न हों, अपने हाथ से काटे हुए बाल मुझे अधिक प्रिय हैं। ' इस उत्तर से मित्रों को आश्चचर्य नहीं हुआ। असल में उस हज्जाम का कोई दोष न था। अगर वह काली चमड़ीवालों के बाल काटने लगता तो उसकी रोजी मारी जाती। हम भी अपने अछूतों के बाल ऊंची जाति के हिंदुओं हज्जामों को कहां काटने देते हैं? दक्षिण अफ्रीका में मुझे इसका बदला एक नहीं अनेक बार मिला है, और चूंकि मैं यह मानता था कि यह हमारे दोष का परिणाम है, इसलिए मुझे इस बात से कभी गुस्सा नहीं आया। स्वावलंबन और सादगी के मेरे शौक ने आगे चलकर जो तीव्र स्वरूप धारण किया, उसका वर्णन यथास्थान होगा। इस चीज की जड़ तो मेरे अंदर शुरू से ही थी। उसके फूलने-फलने के लिए केवल सिंचाई की आवश्यकता थी। वह सिंचाई अनायास ही मिल गई।
बापू से इन्होंने भी ली प्रेरणा
2 अक्टूबर 1869 को जन्में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को करोड़ों लोग अपनी प्रेरणा मानते हैं, फिर चाहे वह देश में हों या परदेश में। अपने या अपने समाज के लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले हर शख्स के लिए बापू का जीवन प्रेरणा का अद्वितीय उदाहरण है। अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा से एक इंटरव्यू में जब पूछा गया कि वह किस जीवित या मृत व्यक्ति के साथ डिनर करने की चाह रखते हैं तो उनका जवाब महात्मा गांधी था। अमेरिका में सिविल राइट्स मूवमेंट चलाने वाले और अफ्रीकी अमेरिकी करोड़ों लोगों के आदर्श और उनके लिए अहिंसात्मक आंदोलन चलाने वाले मार्टिन लूथर किंग का व्यक्तित्व भी महात्मा गांधी से प्रभावित था। वह कहा करते थे ईसा मसीह ने हमको लक्ष्य और महात्मा गांधी ने रणनीति दी है। दुनिया के जीनियस माइंड अल्बर्ट आइंस्टाइन ने तो बापू के बारे में कहा था
संदर्भ ग्रंथ : सत्य के प्रयोग - मोहनदास करमचंद गांधी
प्रस्तुति सर्जना चतुर्वेदी
कि आने वाली पीढ़ियां शायद ही इस बात पर यकीन करेंगी कि कभी पृथ्वी पर ऐसा हाड़-मांस का पुतला भी चला था। दक्षिण अफ्रीकी गांधी के नाम से मशहूर नेल्सन मंडेला की भले ही बापू से कभी मुलाकात न हुई हो मगर बापू की शिक्षा हमेशा उनके 27 साल के जेल के अंधेरे जीवन में रोशनी का काम करती रही।
Wednesday, 18 July 2018
नेल्सन मंडेला - कड़े संघर्ष के साथ धैर्य की मिसाल
अफ्रीकी गांधी के रू प में पहचाने जाने वाले और रंग के आधार पर होने वाले भेदभाव को अफ्रीकी धरती से खत्म करने वाले नेल्सन मंडेला के व्यक्तित्व की पूरी दुनिया कायल है। वैसे तो उनका पूरा जीवन ही कड़े संघर्ष और कभी हार न मानने वाले दृढ़ व्यक्तित्व की मिसाल रहा है लेकिन उनके जीवन से जुड़े कुछ घटनाक्रम ऐसे हैं, जिनसे आम व्यक्ति भी सीख सकता है। आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़े ऐसे ही कुछ किस्से......
शाही जिंदगी को छोड़ चुना कड़ा संघर्ष
आजकल व्यक्ति अपने छोटे-छोटे लाभों के लिए अपने रास्ते और आदर्शों को बदलने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं जबकि कुछ बड़ा हासिल करना हो तो संघर्ष के लिए सदैव तैयार रहना होता है। नेल्सन मंडेला एक शाही परिवार में जन्में थे, यदि वे चाहते तो पूरा जीवन ऐशो-आराम में बीत सकता था लेकिन उन्होनें इसकी जगह 27 वर्ष के कारावास और एक लंबे संघर्ष का चुनाव किया। २७ वर्षों के दौरान अनेक बार दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने नेल्सन मंडेला से उन्हें रिहा करने का प्रस्ताव किया, परन्तु हर बार उन्होंने यह प्रस्ताव यह कहते हुए ठुकरा दिया कि अकेले मुझे आजाद करने से क्या होगा? जब मेरे सारे देशवासी एक तरह की जेल में रह रहे हों तो अकेले मेरी आजादी का क्या मतलब? संभवत: अपने देशवासियों के प्रति उनकी यही प्रतिबद्धता थी जिसने मंडेला को मौत के बीच भी जिंदा रखा।
सीख - कड़े संघर्ष से घबराएं नहीं कुछ बड़ा हासिल करना चाहते हैं, तो कुछ करने के लिए भी तत्पर रहें और निराश न हों।
कड़वी यादों को भूलकर आगे बढ़ें
दक्षिण अफ्रीका में काले और गोरे लोगों के बीच का भेद काफी गहरा था। हर कदम पर सिर्फ रंग के कारण अश्वेत लोगों को अपमानित होना पड़ता था। इस ऐतिहासिक लड़ाई को लडऩे वाले नेल्सनमंडेला ने इन कड़वी यादों को छोड़कर आगे बढऩे वाला जीवन जिया। गोरे और काले लोगों के बीच इस लंबे संघर्ष के कारण पारस्परिक घृणा को समाप्त करना जरूरी था। इस मामले में मंडेला ने अत्यधिक मानवीय उदारता का परिचय दिया। उनका कहना था कि जब तक हम भूतकाल को भुलायेंगे नहीं, तब तक उज्जवल भविष्य का निर्माण संभव नहीं है। एक भव्य समारोह में नेल्सनमंडेला की राष्ट्रपति के रूप में शपथ होनी थी। समारोह में अनेक देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राजा, महाराजा उपस्थित थे। इसी बीच मंडेला ने घोषणा की कि वे सभा का परिचय उनके दो महत्वपूर्ण मेहमानों से करवाएंगे। जिस समय कार्यक्रम स्थल अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों से भरा हो, वह भी ऐसे अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों से जो एक दूसरे को जानते हों, उस समय मंडेला का यह कहना कि वे अपने दो अत्यधिक महत्वपूर्ण मेहमानों से परिचय करवाएंगे, यह सुनना अजीब था। इसके बाद, अपने दोनों ओर खड़े दो गोरे सिपाहियों का परिचय कराते हुए मंडेला ने बताया कि ये दो व्यक्ति ही मेरे महत्वपूर्ण अतिथि हैं। मेरे जेल के दिनों में इन दोनों ने मुझे विभिन्न किस्म की यातनाएं दी थीं। मैं इस बात को जानता हूं कि इन्होंने स्वयं की पहल पर ऐसा नहीं किया था इसलिए मैं इन दोनों को आज क्षमा कर रहा हूं और इनके माध्यम से मैं उन तमाम गोरे लोगों को क्षमा कर रहा हूं जिन्होंने कभी न कभी इस देश के बहुसंख्यक निवासियों पर जुल्म किे ए थे। मैं चाहता हूं कि इस देश के समस्त मूल निवासी हमारे पूर्व गोरे शासकों को माफ कर दें। हम जानते हैं कि उन्हें हमारे बीच रहना है और इसलिए क्यों न हम मिल-जुलकर, अतीत को भुलाकर रहें। कड़वा इतिहास भुलाना ही उचित होता है।
सीख - अतीत में हुई पुरानी कड़वी यादों को भूलकर हमेशा आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करें और लोगों द्वारा कही जाने वाली बेकार की बातों को नजरअंदाज करना सीखें।
वक्त के साथ खुद को बदलना जरूरी
यदि आप किसी व्यक्ति के साथ अच्छा व्यवहार कर रहे हैं और उसके बाद भी वह आपके साथ गलत नीति अपनाए तो समय के अनुसार खुद को बदलना भी जरूरी होता है। नेल्सन मंडेला की पार्टी अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस पहले अहिंसात्मक रास्ते पर चल रही थी और शांतिपूर्ण ढंग से ही अश्वेत लोगों के अधिकारों के लिए लड़ रही थी लेकिन जब वहां की गोरी सरकार के बेगुनाह लोगों पर अत्याचार बढ़ गए तो नेल्सन और उनके साथियों ने भी हिंसा का रास्ता अख्तियार कर लिया।
सीख - परिस्थितियों को देखकर उसके अनुसार निर्णय लें।
Tuesday, 19 September 2017
जार्ज बनार्ड शा नाटककार संघर्ष के साथ सफलता
आप कुछ देखते है, तो कहते हैं क्यों? लेकिन मैं असंभव से सपने देखता हूं और कहता हूं क्योंं नहीं? इस तरह के कई प्रेरक विचारों का सृजन करने वाले और २०वीं सदी के महानतम नाटककार तथा लघुकथा लेखक जार्ज बर्नाड शा की लेखनी के तो वाकई लोग कायल हैं, लेकिन बर्नाड की जिंदगी भी किसी प्रेरक कथा से कम नहीं लगती है। स्कूली शिक्षा भी गरीबी और समस्याओं के साथ पूरी करने वाले शा की यह साहित्य के प्रति लगन ही थी कि उन्हें अंग्रेजी साहित्य के शेक्सपियर के बाद दूसरे सबसे बड़े नाटककार के रूप में जाना जाता है। १९२५ में साहित्य के लिए सबसे प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार और १९३८ में फिल्म पिगमेलियन के लिए ऑस्कर अवार्ड पाने वाले शा इकलौते शख्स हैं, जिन्हें इन दोनों सर्वश्रेष्ठ पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।
एक परिचय
जन्म - २६ जुलाई डबलिन आयरलैंड
मृत्यु - २ नवंबर १९५० सेंट लॉरेंस इंग्लैंड नााटककार, लेखकर, आलोचक
प्रमुख सम्मान - नोबेल पुरस्कार १९२५
ऑस्कर अवार्ड १९३८
चर्चित कृतियां - पिगमेलियन, हार्टब्रेक हाउस, मेजर बारबरा, मेन एंड सुपरमैन, सेंट जॉन आदि।
असफलता से नहीं मानें हार
कोई युवा जब नौकरी की तलाश में जाता है और नहीं मिलती तो वह भी निराश हो जाता है जबकि दुनिया की अधिकांश बड़ी शख्सियतों ने जिंदगी के शुरूआती दौर में असफलताओं का सामना किया है। साहित्यकार-नाटककार जार्ज बर्नार्ड को भी जीवन के प्रारंभिक दौर में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। शुरूआत में एक असफल मर्चेन्ट व्यापारी, सिविल सर्वेन्ट और क्लर्क का काम उन्होंने किया था। एक बार जब शा से किसी ने साहित्य को अपना पेशा चुनने के बारे में पूछा तो उन्होंने अपनी चिर-परिचित शैली में कहा है जीविका के लिए साहित्य को अपनाने का मुख्य कारण यह था कि लेखक को पाठक देखते नहीं हैं इसलिए उसे अच्छी पोशाक की जरूरत नहीं होती। व्यापारी, डॉक्टर, वकील, या कलाकार बनने के लिए मुझे साफ कपड़े पहनने पड़ते और अपने घुटने और कोहनियों से काम लेना छोडऩा पड़ता। साहित्य ही एक ऐसा सभ्य पेशा है जिसकी अपनी कोई पोशाक नहीं है, इसीलिए मैंने इस पेशे को चुना है। फटे जूते, छेद वाला पैजामा, घिस-घिस कर काले से हारा-भूरा हो गया ओवरकोट, बेतरतीब तराशा गया कॉलर, और बेडौल हो चुका पुराना टॉप यही उनकी पोशाक थी। बहुत लंबे समय तक शा लिखते गए लेकिन उनकी किसी भी रचना को प्रकाशन योग्य नहीं समझा गया। किसी प्रकाशक ने कुछ पुराने ब्लॉक खरीद कर स्कूलों में ईनाम देने के लिए कुछ किताबें तैयार करवाईं। उसने शा से कहा कि वे ब्लॉकों के नीचे छापने के लिए कुछ कविताएं लिख दें। शा को इसमें धन प्राप्ति की कोई उम्मीद नहीं थी। उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ जब प्रकाशक ने कविताओं के लिए धन्यवाद पत्र के साथ पांच शिलिंग भी भेजे। अपने साहित्यिक जीवन के प्रारंभिक नौ वर्षों में लिखने की कमाई से वे केवल छ: पौंड ही प्राप्त कर सके, लेकिन शा ने लिखना नहीं छोड़ा और वे बीसवीं शताब्दी के सबसे प्रसिद्ध अंग्रेजी नाटककार बन गए।
नहीं स्वीकार की नोबेल पुरस्कार की राशि
जब सन १९२५ में जार्ज बर्नाड शा को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गई। तो शा ने पुरस्कार तो स्वीकार कर लिया, किंतु पुरस्कार की रकम लेने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा - अब मेरे पास .गुजारे लायक काफी धन है, इनाम की रकम स्वीडन के गरीब लेखकों को दे दी जाए।
जार्ज बर्नार्ड शा के चेक
एक बार जार्ज बर्नार्ड शा ने एक चित्रकार को अपना चित्र बनाने को कहा और वायदा किया कि पसंद आने पर पारिश्रमिक के रूप में एक सौ पौंड देंगे। चित्रकार ने बड़ी मेहनत और लगन से उनका बहुत ही सुंदर चित्र बनाया। शा को वह चित्र बहुत पसंद आया और उन्होंने वायदे के अनुसार चित्रकार को बीस-बीस पौंड के पांच चेक एक प्रशंसा पत्र के साथ भेज दिए। चेक तथा पत्र पाने पर चित्रकार को समझ नहीं आया कि शा ने एक चेक की जगह पांच-पांच चेक क्यों भेजे। अपनी उत्सुकता शांत करने के लिए वह शा से मिला और पूछा,सर पांच-पांच चेक काटने की क्या जरूरत थी, सौ पौंड का एक ही चेक काफी होता। शा ने पूछा, क्या तुमने चेक भुना लिए हैं?नहीं, चित्रकार ने जवाब दिया। शा बोले, अच्छा किया। तुम चेक भुनाना भी मत। इससे तुम्हें भी फायदा होगा और मुझे भी। चित्रकार बोला, मैं कुछ समझा नहीं सर। शा मुस्कुराए और बोले, मैं अपने प्रशंसकों से अपने एक हस्ताक्षर के तीस पौंड लेता हूं। तुम पांचों चेक मेरे प्रशंसकों को बेच दो। इससे तुम्हें एक सौ के बदले डेढ सौ पौंड मिल जाएंगे। इस तरह तुम पचास पौंड ज्यादा कमा लोगे। मेरा फायदा तो समझ में आया पर इससे आप को कैसे फायदा होगा? चित्रकार ने पूछा। ऐसा है कि मेरे प्रशंसक मेरे हस्ताक्षरों को बेचते नहीं हैं। वे उन्हें फ्रेम में मढ़वा कर अपने पास संजोए रखते हैं। इस तरह मेरे भी एक सौ पौंड बच जाएंगे। शा ने हंसते हुए जवाब दिया।
नहीं बनाई कभी दाढ़ी
जॉर्ज बर्नार्ड शा को एक इलैक्ट्रिक शेविंग मशीन बनाने वाले ने अपने इलैक्ट्रिक रेजर का विज्ञापन करने के लिए संपर्क किया। वह चाहता था कि विज्ञापन में शा अपनी दाढ़ी साफ करते हुए दिखें। दाढ़ी शा की शख्सियत से जुड़ चुकी थी और उनकी खास पहचान बन चुकी थी। शा ने मशीन निर्माता को बताया कि उनके पिता ने भी हमेशा दाढ़ी रखी और इसके पीछे एक बहुत विशेष कारण था। शा ने बताया कि , मैं उस समय लगभग पांच साल का था शा ने कहा और मैं अपने पिता के पास खडा हुआ था। वे दाढ़ी बना रहे थे। मैंने उनसे पूछा,डैडी, आप दाढ़ी क्यों बनाते हैं?, मेरे पिता ने कुछ पलों के लिए मेरी ओर देखा और अपना रेजर खिड़की से बाहर फेंकते हुए वे बोले, बेटा, दाढ़ी बनाने की वास्तव में कोई जरूरत नहीं होती, और उस दिन के बाद उन्होंने कभी दाढ़ी नहीं बनाई।
तो कोई और पेशा चुनता
अपने नब्बे वें जन्मदिन पर आयोजित कार्यक्रम में शा को स्कॉट्लैंड यार्ड पुलिस के मशहूर जासूस फेबियन ने सुझाव दिया कि उस मौके के उपलक्ष्य में शा की उंगलियों की छाप लेनी चाहिए ताकि वह हमेशा-हमेशा के लिए संरक्षित हो जाएं। शा की उंगलियों की छाप सबके सामने ली गई लेकिन वह आश्चर्यजनक रूप से बहुत अस्पष्ट आई। यह देखकर शा ने वहां मौजूद लोगों से चुटकी लेते हुए कहा यदि मुझे यह पहले पता होता तो मैंने कोई और पेशा अख्तियार किया होता।
किस चिडिय़ा का नाम है
ब्रौडवे थियेटर में प्रसिद्ध नाटककार सर सेड्रिक हार्डविक 'सीजर एंड क्लियोपेट्राÓ नाटक का निर्देशन कर रहे थे शा भी वहां उपस्थित थे। सेड्रिक अपने किशोरवय पुत्र को शा से मिलाने ले गए। जब वे विदा लेने लगे तो शा ने सेड्रिक के पुत्र से कहा लड़के, एक दिन तुम अपने पोते-पोतियों को यह बताओगे कि तुमने जॉर्ज बर्नार्ड शा को देखा हुआ है और जरा सा ठहरकर शा मुस्कुराते हुए बोले और वे कहेंगे 'ये किस चिडिय़ा का नाम है!Ó
आप सिर्फ कला में रूचि रखते हैं
एमजीएम स्टूडियो के मालिक सैमुअल गोल्डविन बर्नार्ड शा के कई नाटकों पर फिल्म बनाने के अधिकार खरीदना चाहते थे इससे जुड़ी राशि पर लंबी बहस होने के बाद शा ने अंतत: गोल्डविन के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने गोल्डविन से बड़े तल्ख़ अंदाज में कहा हमारे बीच कोई समझौता नहीं हो सकता मिस्टर गोल्डविन क्योंकि आप सिर्फ कला में रूचि रखते हैं और मैं सिर्फ पैसे में।
Friday, 13 March 2015
Tuesday, 6 January 2015
Thursday, 13 November 2014
भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान आईआईएसईआर विज्ञान की ओर बढ़ाएं अपने कदम
| भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान आईआईएसईआर विज्ञान की ओर बढ़ाएं अपने कदम |
|---|
|
अगर
बचपन से ही विज्ञान के अलग-अलग पहलुओं से जुड़े सवाल आपको परेशान करते हैं
और जब तक आप उनका जवाब नहीं जान लेते हैं, तब तक आपको सुकून नहीं मिलता है,
तो समझ लीजिए कि विज्ञान ही आपका पसंदीदा विषय है। विज्ञान के क्षेत्र में
रुचि रखने वाले अनुसंधान से जुड़े भारतीय छात्रों के लिए भारत सरकार ने
भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान को स्थापित किया है। यह शिक्षण
और अनुसंधान विज्ञान के प्रति आपकी रुचि को देखते हुए आपके ज्ञान को विकसित
करने में अपनी भूमिका निभाता है। मध्यप्रदेश में अध्ययन करने वाले छात्रों
के लिए गौरव की बात है कि 2008 में यह संस्थान प्रदेश की राजधानी भोपाल
में भी शुरू हो गया। विज्ञान विषय में ही यदि आप अपना कॅरियर बनाने की चाह
रखते हैं तो निश्चित ही इस संस्थान में प्रवेश ले सकते हैं।
क्यों की गई स्थापना
प्रो. सी.एन.आर. राव की अध्यक्षता में प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक परामर्शी
परिषद (एसएसी-पीएम) ने विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान को समर्पित पांच नए
संस्थानों की स्थापना करने की सिफारिश की थी, जिसका नाम आईआईएस बंगलौर की
तर्ज पर ‘भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान परिषद’ होगा।
इन संस्थानों का लक्ष्य आधुनिक अनुसंधान सहित एकीकृत आधारभूत विज्ञान में
शिक्षण और शिक्षा के ऊंचे मानकों के अनुसंधान केन्द्र स्थापित करना है। ये
संस्थान अनुसंधान के बौद्धिक वातावरण में विज्ञान में अवरस्नातक और
स्नातकोत्तर शिक्षण को समर्पित होंगे और विज्ञान के एकीकृत शिक्षण और
अध्ययन में अवसर प्रदान करके आधारभूत विज्ञान में युवाओं को आकर्षक रोज़गार
प्रदान करेंगे।
आईआईएसईआर स्थापना का
लक्ष्य -
आधारभूत विज्ञान में गुणवत्तायुक्त शिक्षा और अनुसंधान प्रदान करना।
उच्च गुणवत्तायुक्त शैक्षिक संकाय को आकर्षित और पोषित करना।
कम उम्र में अनुसंधान में प्रवेश प्रदान करने के उद्देश्य से विज्ञान में
एकीकृत स्नातकोत्तर कार्यक्रम प्रारंभ करना इसके अतिरिक्त यह संस्थान
विज्ञान में अवर स्नातक डिग्री रखने वाले स्नातकोत्तर और पीएचडी के एकीकृत
कार्यक्रम प्रदान करेगा। विज्ञान में लचीले पाठ्यक्रम को संभव बनाना।
वर्तमान विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के साथ सशक्त संबंध स्थापित करना और
प्रयोगशाला और संस्थाओं के साथ नेटवर्क स्थापित करना। उन्नत अनुसंधान
प्रयोगशालाएं और केन्द्रीय सुविधाएं स्थापित करना। उन्नत अनुसंधान
प्रयोगशालाएं और केन्द्रीय सुविधाएं स्थापित करना।
यह कोर्स कर सकते हैं
बीएसएमएस-ड्यूल डिग्री प्रोग्राम
बीएसएमएस - बैचलर ऑफ साइंस, मास्टर ऑफ साइंस 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के
बाद बीएसएमएस के कोर्स में एडमीशन लिया जा सकता है। इस कोर्स को बायोलॉजिकल
साइंस, केमिस्ट्री, मैथमेटिक्स, फिजिक्स में किया जा सकता है।
डॉक्टरल प्रोग्राम-पीएचडी
ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद कुछ स्टूडेंट्स
जॉब करने की चाह रखते हैं तो कुछ पीएचडी करके रिसर्च की फील्ड में जाने की
चाह रखते हैं। इसलिए यदि आप पोस्ट ग्रेजुएशन कंप्लीट करने के बाद पीएचडी
करने की चाह रखते हैं तो आईआईएसईआर के डॉक्टरल प्रोग्राम पीएचडी में आप
प्रवेश ले सकते हैं।
इन विषयों में कर सकते हैं पीएचडी
बायोलॉजिकल साइंस, केमिस्ट्री
अर्थ एंड एन्वायरमेंटल साइंस
मैथमेटिक्स, फिजिक्स
ऐसे मिलेगा प्रवेश
अगर आप पीएचडी कार्यक्रम में प्रवेश लेना चाहते हैं तो उसके लिए आपको
संबंधित विषय में एमएससी, एमएस, एमटेक या एमबीबीएस समेत मास्टर डिग्री होना
जरूरी है।
इसके साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली प्री पीएचडी प्रवेश परीक्षा को
भी क्वालीफाई करना जरूरी है। इसके साथ ही इंजीनियरिंग के छात्र को ग्रेजुएट
एप्टीट्यूट टेस्ट में भी एक अच्छी रैंक होना जरूरी है या फिर काउंसिल ऑफ
साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रीयल रिसर्च सीएसआईआर, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग
यूजीसी द्वारा आयोजित की जाने वाली नेट, जेआरएफ या उसके समकक्ष परीक्षा पास
किए हुए प्रतिभागी भी इस कोर्स में शामिल हो सकते हैं।
पीएचडी कार्यक्रम के लिए चयनित युवा किसी अन्य स्कॉलरशिप को प्राप्त नहीं कर सकते हैं।
इन विषयों में कर सकते हैं पीएचडी
बायोलॉजीकल साइंस, केमिस्ट्री
अर्थ एंड एन्वायरमेंटल साइंस
मैथमेटिक्स
फिजिक्स
पीएचडी प्रोग्राम में शामिल होने वाले प्रतिभागियों को कोर्स वर्क,
क्वालीफाइंग एग्जाम, डिजर्टेशन के अलावा विभिन्न सेमिनार, कॉन्फ्रेंस,
वर्कशॉप में हिस्सा लेने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है, ताकि वह अपनी
क्षमता का अधिक से अधिक बेहतर उपयोग कर सकें।
यह सुविधाएँ हैं मौजूद
ई-लाइब्रेरी और कंप्यूटर सेंटर
छात्रों को पढ़ने के लिए विषय संबंधी किताबें और रिसर्च जर्नल, ई-बुक
आईआईएसईआर की लाइब्रेरी में मौजूद है। इसके साथ ही लाइब्रेरी इंटरनेट से
कनेक्ट है, साथ ही देश में मौजूद अन्य आईआईएसईआर की लाइब्रेरी की भी
इंटरनेट लिंक लाइब्रेरी में उपलब्ध हैं। इसके साथ ही अपडेट कंम्प्यूटर
इंटरनेट फेसिलिटी के साथ यहाँ मौजूद हैं।
रिसर्च के लिए अत्याधुनिक उपकरण मौजूद
संस्थान में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को रिसर्च के लिए आवश्यक अत्याधुनिक
उपकरण भी यहाँ मौजूद हैं। इसके साथ ही हॉस्टल, कॉन्फ्रेंस हॉल,
ट्रांसपोर्ट, हेल्थ सेंटर, ई-क्लास रूम की सुविधाएं भी यहाँ छात्र-छात्राओं
के लिए हैं।
कॅरियर की राह
यदि आप रिसर्च के क्षेत्र में जाना चाहते हैं या फिर वैज्ञानिक के तौर पर
अपना कॅरियर बनाने की चाह रखते हैं तो आईआईएसईआर आपको इसके लिए संभावनाएं
उपलब्ध कराता है। इसके साथ ही यहां से पढ़ाई करने के बाद आप टीचिंग की फील्ड
में भी अपना बेहतर कल देख सकते हैं। संस्थान में कॅरियर डेवलपमेंट सेंटर
के माध्यम से छात्रों की भी कॅरियर संबंधी समस्याओं का समाधान किया जाता
है।
ऐसे मिलेगा प्रवेश
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईएसईआर) के ड्यूअल
डिग्री पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए आवेदन प्रक्रिया की शुरुआत जून-जुलाई
में होती है। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा संचालित आईआईएसईआर के
पाँचों कैंपस में एक साथ प्रवेश प्रक्रिया आयोजित की जाती है। विज्ञान
विषयों में मौलिक शोध और शिक्षण कार्य को बढ़ावा देने के लिए इन विशिष्ट
संस्थानों की स्थापना की गई थी। सबसे पहले वर्ष 2006 में पुणे और कोलकाता
में ये संस्थान अस्तित्व में आए। इसके बाद 2007 में मोहाली और अगले साल
तिरवनंतपुरम और भोपाल में इनकी स्थापना हुई।
दाखिले के लिए जरूरी योग्यता, चयन की प्रक्रिया और आवेदन से संबंधित सभी महत्वपूर्ण जानकारी -
बीएस-एमएस (ड्यूअल डिग्री)
उपलब्ध सीट - 950
अवधि - पाँच साल
शैक्षणिक योग्यता किसी मान्यता प्राप्त स्कूल शिक्षा बोर्ड/यूनिवर्सिटी से विज्ञान विषयों के साथ बारहवीं पास।
चयन प्रक्रिया
- आईआईएसईआर में छात्रों के दाखिले के लिए तीन माध्यमों का उपयोग किया जाता है।
- पहला माध्यम है किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना (केवीपीवाई) की बेसिक
साइंस स्ट्रीम। इस योजना के तहत एसए/एसएक्स/एसबी में क्वालीफाई कर चुके
छात्र आवेदन कर सकते हैं।
- दूसरा माध्यम है आईआईटी में प्रवेश के लिए आयोजित होने वाला जेईई
(एडवांस्ड), इस साल इस परीक्षा में आईआईटी में दाखिले के लायक रैंक प्राप्त
करने वाले छात्र यहाँ प्रवेश के लिए आवेदन कर सकते हैं। ऐसे आवेदकों का 60
फीसदी अंकों के साथ बारहवीं पास होना भी जरूरी है।
- आखिरी माध्यम है राज्यों या केंद्र के स्कूल शिक्षा बोर्ड। जो छात्र
अपने स्कूल शिक्षा बोर्ड से बारहवीं की परीक्षा (2013 या 2014) में मिले
औसत अंकों के आधार पर इंस्पायर स्कॉलरशिप के लिए योग्य हैं, वह आईआईएसईआर
में प्रवेश ले सकते हैं। ‘इंस्पायर’ के लिए केंद्र सरकार का डिपार्टमेंट ऑफ
साइंस एंड टैक्नोलॉजी कट ऑफ प्रतिशत निर्धारित करता है।
ओबीसी और शारीरिक अशक्त वर्ग के छात्रों का तय कट ऑफ में पाँच फीसदी की
राहत मिलेगी। हालांकि एससी और एसटी क लिए कट ऑफ 55 फीसदी रखा गया है। इस कट
ऑफ में आने वाले छात्रों को आईआईएसईआर के एप्टीट्यूट टेस्ट को भी पास करना
होगा।
- कुल सीटों का 50 फीसदी जेईई (एडवांस्ड) के माध्यम से भरा जाएगा और 25
बोर्डों के उन 12वीं पास छात्रों से भरा जाएगा, जो आईआईएसईआर के एप्टीट्यूड
टेस्ट की
शीर्ष रैंकिंग में स्थान पाएंगे।
एप्टीट्यूट टेस्ट का प्रारूप
- यह परीक्षा कुल 60 बहुविकल्पीय प्रश्नों पर आधारित होती है। ये प्रश्न
बायोलॉजी, केमिस्ट्री, मैथमेटिक्स और फिजिक्स से संबंधित होंगे। चारों
विषयों से 15-15 प्रश्न पूछे जाएंगे। प्रश्न 11वीं और 12वीं के पाठ्यक्रम
पर आधारित होंगे।
- प्रश्नों को हल करने के लिए 180 मिनट का समय मिलेगा।
- हर प्रश्न तीन अंक का होगा और गलत जवाब देने पर एक अंक काटा जाएगा।
टेस्ट का आयोजन
देश के 15 शहरों में एप्टीट्यूट टेस्ट आयोजित किया जाता है। इनमें
वाराणसी, दिल्ली, कोलकाता, भोपाल, पुणे, तिरुवनंतपुरम, मोहाली और भुवनेश्वर
आदि शहर शामिल हैं।
आवेदन शुल्क
- सामान्य और ओबीसी वर्ग के छात्रों के लिए शुल्क 600 रुपये है।
- यह शुल्क एससी और एसटी वर्ग के लिए 300 रुपये निर्धारित किया गया है।
- इसका भुगतान एसबीआई की नेट बैंकिंग सेवा के माध्यम से किया जा सकता है।
जरूरी सूचनाएँ
- केवीपीवाई या जेईई (एडवांस्ड) माध्यम से आवेदन करने वाले छात्रों को
उनकी रैंकिंग के अनुसार सीधे काउंसलिंग में शामिल होने का मौका मिलेगा। ऐसे
छात्र पाँच आईआईएसईआर में से किसी एक में काउंसलिंग के लिए पहुंच सकते
हैं।
- जो छात्र चयन प्रक्रिया से संबंधित तीनों माध्यमों की योग्यता को पूरा
करते हैं, वह तीनों माध्यमों से आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए अलग-अलग फॉर्म
भरने होंगे और आवेदन शुल्क भी अलग-अलग ही देना होगा।
- काउंसलिंग में शामिल होने के लिए उन्हीं छात्रों को बुलाया जाएगा, जो उपलब्ध सीटों के अनुसार रैंकिंग या मेरिट में स्थान प्राप्त करेंगे। आवेदन प्रक्रिया
- वेबसाइट (www.iiser-admi ssion s.in) के होमपेज पर उपलब्ध लिंक पर क्लिक करें।
- इसके बाद ‘गो टू एप्लीकेशन फॉर्म’ ऑप्शन पर क्लिक करके फॉर्म को भरें। फिर आवेदन शुल्क का भुगतान करें और फॉर्म को सबमिट करें।
अधिक जानकारी यहाँ
फोन- 0755-6692409
ई-मेल :admissions@iiserb.ac.in पर भी कर सकते हैं।
देश में स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान
1. भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान (आईआईएसईआर), कोलकाता आईआईएसईआर कोलकाता अगस्त 2006 में स्थापित किया गया।
आईआईएसईआर कोलकाता एकीकृत बीएस-एमएस कार्यक्रम, एमएस कार्यक्रम, एकीकृत
पीएचडी कार्यक्रम, पीएचडी कार्यक्रम और पोस्ट डॉक्टरल कार्यक्रम प्रदान
करता है। अधिक जानकारी के लिए कृपया http://www.iiserkol.ac.in पर क्लिक
करें।
2. भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर), पुणे
आईआईएसईआर पुणे 2006 में स्थापित किया गया जो आधारभूत विज्ञान में
अनुसंधान और शिक्षण प्रदान करने के लिए समर्पित मुख्य संस्थान है। एकीकृत
मास्टर कार्यक्रम का लक्ष्य बॉयोलॉजिकल, कैमिकल, मैथामेटिकल और फिजिकल
साइंस में पारंपरिक विषयों को साथ लाते हुए विज्ञान शिक्षा अनुभव के साथ
पारंपरिक अवर स्नातक और स्नातकोत्तर कार्यक्रम को एकीकृत करना है। यह
कार्यक्रम विज्ञान के समान प्रकृति पर फोकस करता है। अधिक जानकारी के लिए
कृपया http:/www.iiserpune.ac.in पर क्लिक करें।
3. भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर), मोहाली
आईआईएसईआर मोहाली वर्ष 2007 से स्वायत्त शैक्षिक संस्थान के रूप में
स्थापित किया गया। जिसका उद्देश्य अवर स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर
गुणवत्तायुक्त विज्ञान शिक्षा और विज्ञान के मुख्य क्षेत्रों में अनुसंधान
प्रदान करना है। आईआईएसईआर मोहाली का मुख्य फोकस शिक्षा के साथ वैज्ञानिक
अनुसंधान में एकीकृत उत्कृष्टता पर है।
आईआईएसईआर मोहाली एकीकृत स्नातकोत्तर स्तर के कार्यक्रम, डॉक्टरल
कार्यक्रम एकीकृत डॉक्टरल कार्यक्रम प्रदान करता है। अधिक जानकारी के लिए
कृपया http://www.iisermohali.ac.in पर क्लिक करें।
4. भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर), भोपाल
आईआईएसईआर भोपाल अवर स्नातक और स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को उच्च
गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से वर्ष 2008 में स्थापित
किया गया था। वर्तमान में आईआईएसईआर भोपाल बीएस-एमएस (दोहरी डिग्री)
कार्यक्रम पीएचडी कार्यक्रम प्रदान करता है। अधिक जानकारी के लिए कृपया
http://www.iiserbhopal.ac.in पर क्लिक करें।
5. भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) तिरुवनंतपुरम
भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर)
तिरुव-नंतपुरम अगस्त 2008 में स्थापित किया गया था और अंतर्राष्ट्रीय
मानकों के वैज्ञानिक अनुसंधान और विज्ञान शिक्षा प्रदान करने के लिए
समर्पित है। भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर)
तिरूवनंतपुरम, गणित, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान और
अंतरविषयक क्षेत्रों में पाँच वर्षीय एकीकृत एमएस और पीएचडी कार्यक्रम
प्रदान करता है। अधिक जानकारी के लिए http://www.iisertvm.ac.in पर क्लिक
करें।
|
Wednesday, 29 October 2014
- सािहत्य में अपनी ही िजंदगी का ताना-बाना - रिचर्ड फ्लेंगन
शख्सियत - िरचर्ड फ्लेंगन
- सािहत्य में अपनी ही िजंदगी का ताना-बाना - रिचर्ड फ्लेंगन
- संघर्ष के सृजन का सफर
जब कोई सािहत्यकार अपनी कृित का सृजन करता है तो वह निश्चत ही उस समय यह नहीं जानता िक उसकी कौन सी कृित सर्वश्रेष्ठ होगी या नहीं वह िसर्फ अपनी ओर से सिर्फ प्रयास करता है। ऐसा ही प्रयास करके हाल ही में मैन बुकर पुस्कार जीतकर चर्चा में आए हैं ऑस्ट्रेलिया के रिचर्ड फ्लेंगन। रिचर्ड की यह किताब इसलिए भी खास है क्योंिक यह िकताब एक लेखक ने नहीं बल्कि एक बेटे ने अपने िपता और अन्य कैदियों द्वारा भोगी गई यातनाओं का वर्णन करती हुई है। द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ को अपने जीवन के 12 बरस देकर िलखने वाले तस्मानिया में जन्मे रिचर्ड ने इसे अपने िपता कैदी नंबर 335 को समर्पित किया है। फ्लेंगन के जीवन, साहित्य सृजन का एक सफर।
16 बरस में छोड़ा स्कूल बाद में बने टॉपर
िरचर्ड के जीवन के संघर्ष का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है िक उनके पिता एक कैदी थे। तस्मानिया के रोजबेरी टाउन में 1961 में जन्मे रिचर्ड अपने माता-पिता की 6 संतानों में से 5वे नंबर की संतान है। रिचर्ड ने भले ही बुकर हासिल िकया हो मगर उनके दादा-दादी गरीब के साथ-साथ अशिक्षित थे लेिकन फ्लेंगन के माता-िपता शिक्षा के महत्व को जानते थे और इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को हर कीमत पर शिक्षा पाने के लिए प्रेरित िकया। फ्लेंगन ने अपने अिभभावक की इस बात के महत्व को समझा और गरीबी के चलते भले ही उन्होंने 16 बरस की उम्र में स्कूल छोड़कर मजदूरी की और तब वह एक बढ़ई बनने की चाह भी रखने लगे थे लेिकन अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के बूते
फ्लेंगन ने 1982 में तस्मानिया यूनिवर्सिटी से फर्स्ट क्लास ऑनर के साथ अपनी ग्रेजुएशन की िडग्री हासिल की। बाद में रॉडेस स्कॉलरशिप लेकर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ लैटर्स डिग्री प्राप्त की।
िजंदगी की कड़वाहट को बुना मीठे शब्दों में
अक्सर कहा जाता है कि अपने जीवन की बुरी यादों को याद नहीं रखना चाहिए लेिकन अपने पिता, अपने परिवार और खुद अपने जीवन की कड़वाहट को खूबसूरत शब्दों में ढालकर रिचर्ड फ्लेंगन ने अपने साहित्य का सृजन िकया है। यह वाकई एक अिद्वतीय िमसाल है। िरचर्ड के भाई और पत्रकार,लेखक मािर्टन फ्लेंगन के मुताबिक रिचर्ड को नदी में तैरना बचपन से ही पसंद था। जब वह 11 साल का था तब मैं और मेरा भाई िटम नदी में तैरते हुए रिचर्ड के नजर न आने को लेकर कई बार परेशान भी हो जाते थे तभी अचानक उसके नन्हें हाथों के नजर आने पर खुश हो जाते थे। लहरों से संघर्ष के इस खेल ने ही िरचर्ड को बहादुरी के साथ संघर्ष करना सिखा दिया था। मार्टिन ने एक ऑस्ट्रेिलयाई अखबार के लिए लिखा है कि 1997 में जब रिचर्ड का पहला नॉवेल डेथ अॉफ अ रिवर गाइड आया और उसे मैंने पढ़ा तो मुझे लगा कि इसके हर िबंदू को मैं जानता हूं, बस िरचर्ड ने उन्हें एक फ्रेम में शब्दों के साथ मढ़ िदया। बतौर मार्टिन इसी तरह 2002 में प्रकाशित हुए फ्लेंगन के नॉवेल गुल्ड बुक ऑफ ए िफश भी उसके बचपन की ही यादों से जुड़ा है क्योंिक वह जहां बचपन में रहता था वह गांव खदान, पहाड़ और नदी से घिरा हुआ था। और बुकर पुरस्कार फ्लेंगन के जिस उपन्यास को िमला है द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ वह डेथ रेल्वे के नाम से पहचाने जाने वाले बर्मा - थाइलैंड पर केिन्द्रत है। हमारे िपता आर्की फ्लेंगन जो एक आम आदमी थे और उनके जैसे लाखों
कैिदयों का संघर्ष इस नॉवेल में फ्लेंगन ने िलखा है। जापानी साम्राज्य के क्रूर अत्याचार और लाखों गुलामों की मदद से 1943में बनाए गए इस रेल मार्ग को लेकर लोगों के संघर्ष को फ्लेंगन ने प्यार और अन्य खूबसूरत घटनाक्रमों के साथ आकार िदया है। मािर्टन के शब्दों में इसलिए जब मैंने इस नॉवेल को एक साल पहले लांच िकया था तभी कहा था िक इसका बढ़ा प्रभाव होगा।
िपता की चाह थी और वह पूरी हुई
यह दुर्लभ सा संयोग ही है कि फ्लेंगन के पिता शायद इस नॉवेल के पूरे होने का ही इंतजार कर रहे थे, क्योंिक फ्लेंगन का यह उपन्यास जिस डेथ रेल्वे पर केिन्द्रत है। फ्लेंग
के पिता उसके निर्माण कार्य में लगे एक कैदी थे। अपने आपको डैथ रेल्वे का बेटा कहने वाले फ्लेंगन जब इस उपन्यास को पूरा कर रहे थे। तभी उनके िपता की याददाश्त धीरे-धीरे बिल्कुल खत्म होने लगी थी और फ्लेंगन को कुछ भी उस दौर का बता पाने में असमर्थ हो गए थे। तब फ्लेंगन ने तस्मािनया जाकर उस दौर के लोगों से मुलाकात की और िस्थति को जाना। फ्लेंगन के मुतािबक इस किताब को िलखते समय कई बार लगा कि यह शायद पूरा नहीं हो पाएगा मगर सिर्फ मेरे पिता को भरोसा था िक मैं इसे पूरा कर लूंगा। उपन्यास लेखन के अंतिम छ: महीने तस्मािनया में ही रहकर उसे पूरा करने वाले फ्लेंगन के 99 वर्षीय िपता जो िक फ्लेंगन की बहन के साथ रहते थे, एक दिन कॉल करके फ्लेंगन से उपन्यास पूरा होने के बारे में पूछा और फ्लेंगन ने बताया िक हां वह पूरा हो गया है और उसे मैंने प्रकाशक को ईमेल कर िदया है, यह जानने के चंद घंटों बाद ही उसी रात फ्लेंगन के पिता ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
अिवस्मरणीय है मेरे लिए यह क्षण
रिचर्ड फ्लेंगन को जब लंदन में मैन बुकर पुरस्कार से सम्मानित करते हुए उन्हें डचेस ऑफ कॉर्नवाल ट्राफी और 50 हजार पाउंड से सम्मानित किया गया तब फ्लेंगन ने कहा िक ऑस्ट्रेलिया में बुकर सम्मान को भाग्यशाली चिकन के तौर पर देखा जाता है और मुझे यह िमल रहा है। यह मेरे लिए गर्व की बात है। रिचर्ड ने कहा कि मैं साहित्य की परंपरा से नहीं आता हूं, मेरे दादा-दादी अनपढ़ थे। मैं एक छोटे से कस्बेे से आता हूं जो पर्वत और बारिश से िघरा हुआ आइसलैंड है। फ्लेंगन ने कहा िक मैंने यह कभी नहीं सोचा था िक लंदन के इस ग्रेंड हॉल में मुझे कभी सम्मानित किया जाएगा। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। इस दौरान फ्लेंगन ने िपता को समर्पित करते हुए इस सम्मान के लिए िनर्णायकों को धन्यवाद िदया। साथ ही 30 सालों से हर पल साथ िनभाने वाली अपनी पत्नी माजदा को लेखन के इस सफर में साथ देने के लिए शुिक्रया अदा िकया और अपने उपन्यास की प्रकाशक निक्की िक्रस्टर को भी धन्यवाद दिया।
तस्मानिया के पहले और ऑस्ट्रेिलया के तीसरे बुकर
सम्मान
2014 मैन बुक प्राइज, िब्रटेन
2011 तस्मािनया बुक प्राइज, वॉनि्टंग
2009 क्वीनसलैंड प्रीमियर लिटररी अवार्ड एंड फिक्शन वॉनि्टंग
2009 मिल्स फ्रेंकलिन अवॉर्ड, ऑस्ट्रेिलया वॉनि्टंग शॉर्टलिस्ट
2008 वेस्टर्न ऑस्ट्रेिलयन प्रीमियर लिटररी अवॉर्ड फॉर फिक्शन वॉनि्टंग
2002 कॉमनवेल्थ राइटर्स प्राइज - गुल्ड बुक ऑफ फिश- अ नॉवेल इन ट्वेलव फिश
कृितयां
2013 द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ
2009 वॉनि्टंग
2007 अननोन टेरेिरस्ट
2002 गुल्ड बुक ऑफ ए फिश-अ नॉवेल इन ट्वेलव फिश
1998 द साउंड ऑफ वन हेंड क्लेपिंग
1997 डेथ अॉफ अ रिवर गाइड
- सािहत्य में अपनी ही िजंदगी का ताना-बाना - रिचर्ड फ्लेंगन
- संघर्ष के सृजन का सफर
जब कोई सािहत्यकार अपनी कृित का सृजन करता है तो वह निश्चत ही उस समय यह नहीं जानता िक उसकी कौन सी कृित सर्वश्रेष्ठ होगी या नहीं वह िसर्फ अपनी ओर से सिर्फ प्रयास करता है। ऐसा ही प्रयास करके हाल ही में मैन बुकर पुस्कार जीतकर चर्चा में आए हैं ऑस्ट्रेलिया के रिचर्ड फ्लेंगन। रिचर्ड की यह किताब इसलिए भी खास है क्योंिक यह िकताब एक लेखक ने नहीं बल्कि एक बेटे ने अपने िपता और अन्य कैदियों द्वारा भोगी गई यातनाओं का वर्णन करती हुई है। द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ को अपने जीवन के 12 बरस देकर िलखने वाले तस्मानिया में जन्मे रिचर्ड ने इसे अपने िपता कैदी नंबर 335 को समर्पित किया है। फ्लेंगन के जीवन, साहित्य सृजन का एक सफर।
16 बरस में छोड़ा स्कूल बाद में बने टॉपर
िरचर्ड के जीवन के संघर्ष का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है िक उनके पिता एक कैदी थे। तस्मानिया के रोजबेरी टाउन में 1961 में जन्मे रिचर्ड अपने माता-पिता की 6 संतानों में से 5वे नंबर की संतान है। रिचर्ड ने भले ही बुकर हासिल िकया हो मगर उनके दादा-दादी गरीब के साथ-साथ अशिक्षित थे लेिकन फ्लेंगन के माता-िपता शिक्षा के महत्व को जानते थे और इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को हर कीमत पर शिक्षा पाने के लिए प्रेरित िकया। फ्लेंगन ने अपने अिभभावक की इस बात के महत्व को समझा और गरीबी के चलते भले ही उन्होंने 16 बरस की उम्र में स्कूल छोड़कर मजदूरी की और तब वह एक बढ़ई बनने की चाह भी रखने लगे थे लेिकन अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के बूते
फ्लेंगन ने 1982 में तस्मानिया यूनिवर्सिटी से फर्स्ट क्लास ऑनर के साथ अपनी ग्रेजुएशन की िडग्री हासिल की। बाद में रॉडेस स्कॉलरशिप लेकर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ लैटर्स डिग्री प्राप्त की।
िजंदगी की कड़वाहट को बुना मीठे शब्दों में
अक्सर कहा जाता है कि अपने जीवन की बुरी यादों को याद नहीं रखना चाहिए लेिकन अपने पिता, अपने परिवार और खुद अपने जीवन की कड़वाहट को खूबसूरत शब्दों में ढालकर रिचर्ड फ्लेंगन ने अपने साहित्य का सृजन िकया है। यह वाकई एक अिद्वतीय िमसाल है। िरचर्ड के भाई और पत्रकार,लेखक मािर्टन फ्लेंगन के मुताबिक रिचर्ड को नदी में तैरना बचपन से ही पसंद था। जब वह 11 साल का था तब मैं और मेरा भाई िटम नदी में तैरते हुए रिचर्ड के नजर न आने को लेकर कई बार परेशान भी हो जाते थे तभी अचानक उसके नन्हें हाथों के नजर आने पर खुश हो जाते थे। लहरों से संघर्ष के इस खेल ने ही िरचर्ड को बहादुरी के साथ संघर्ष करना सिखा दिया था। मार्टिन ने एक ऑस्ट्रेिलयाई अखबार के लिए लिखा है कि 1997 में जब रिचर्ड का पहला नॉवेल डेथ अॉफ अ रिवर गाइड आया और उसे मैंने पढ़ा तो मुझे लगा कि इसके हर िबंदू को मैं जानता हूं, बस िरचर्ड ने उन्हें एक फ्रेम में शब्दों के साथ मढ़ िदया। बतौर मार्टिन इसी तरह 2002 में प्रकाशित हुए फ्लेंगन के नॉवेल गुल्ड बुक ऑफ ए िफश भी उसके बचपन की ही यादों से जुड़ा है क्योंिक वह जहां बचपन में रहता था वह गांव खदान, पहाड़ और नदी से घिरा हुआ था। और बुकर पुरस्कार फ्लेंगन के जिस उपन्यास को िमला है द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ वह डेथ रेल्वे के नाम से पहचाने जाने वाले बर्मा - थाइलैंड पर केिन्द्रत है। हमारे िपता आर्की फ्लेंगन जो एक आम आदमी थे और उनके जैसे लाखों
कैिदयों का संघर्ष इस नॉवेल में फ्लेंगन ने िलखा है। जापानी साम्राज्य के क्रूर अत्याचार और लाखों गुलामों की मदद से 1943में बनाए गए इस रेल मार्ग को लेकर लोगों के संघर्ष को फ्लेंगन ने प्यार और अन्य खूबसूरत घटनाक्रमों के साथ आकार िदया है। मािर्टन के शब्दों में इसलिए जब मैंने इस नॉवेल को एक साल पहले लांच िकया था तभी कहा था िक इसका बढ़ा प्रभाव होगा।
िपता की चाह थी और वह पूरी हुई
यह दुर्लभ सा संयोग ही है कि फ्लेंगन के पिता शायद इस नॉवेल के पूरे होने का ही इंतजार कर रहे थे, क्योंिक फ्लेंगन का यह उपन्यास जिस डेथ रेल्वे पर केिन्द्रत है। फ्लेंग
के पिता उसके निर्माण कार्य में लगे एक कैदी थे। अपने आपको डैथ रेल्वे का बेटा कहने वाले फ्लेंगन जब इस उपन्यास को पूरा कर रहे थे। तभी उनके िपता की याददाश्त धीरे-धीरे बिल्कुल खत्म होने लगी थी और फ्लेंगन को कुछ भी उस दौर का बता पाने में असमर्थ हो गए थे। तब फ्लेंगन ने तस्मािनया जाकर उस दौर के लोगों से मुलाकात की और िस्थति को जाना। फ्लेंगन के मुतािबक इस किताब को िलखते समय कई बार लगा कि यह शायद पूरा नहीं हो पाएगा मगर सिर्फ मेरे पिता को भरोसा था िक मैं इसे पूरा कर लूंगा। उपन्यास लेखन के अंतिम छ: महीने तस्मािनया में ही रहकर उसे पूरा करने वाले फ्लेंगन के 99 वर्षीय िपता जो िक फ्लेंगन की बहन के साथ रहते थे, एक दिन कॉल करके फ्लेंगन से उपन्यास पूरा होने के बारे में पूछा और फ्लेंगन ने बताया िक हां वह पूरा हो गया है और उसे मैंने प्रकाशक को ईमेल कर िदया है, यह जानने के चंद घंटों बाद ही उसी रात फ्लेंगन के पिता ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
अिवस्मरणीय है मेरे लिए यह क्षण
रिचर्ड फ्लेंगन को जब लंदन में मैन बुकर पुरस्कार से सम्मानित करते हुए उन्हें डचेस ऑफ कॉर्नवाल ट्राफी और 50 हजार पाउंड से सम्मानित किया गया तब फ्लेंगन ने कहा िक ऑस्ट्रेलिया में बुकर सम्मान को भाग्यशाली चिकन के तौर पर देखा जाता है और मुझे यह िमल रहा है। यह मेरे लिए गर्व की बात है। रिचर्ड ने कहा कि मैं साहित्य की परंपरा से नहीं आता हूं, मेरे दादा-दादी अनपढ़ थे। मैं एक छोटे से कस्बेे से आता हूं जो पर्वत और बारिश से िघरा हुआ आइसलैंड है। फ्लेंगन ने कहा िक मैंने यह कभी नहीं सोचा था िक लंदन के इस ग्रेंड हॉल में मुझे कभी सम्मानित किया जाएगा। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। इस दौरान फ्लेंगन ने िपता को समर्पित करते हुए इस सम्मान के लिए िनर्णायकों को धन्यवाद िदया। साथ ही 30 सालों से हर पल साथ िनभाने वाली अपनी पत्नी माजदा को लेखन के इस सफर में साथ देने के लिए शुिक्रया अदा िकया और अपने उपन्यास की प्रकाशक निक्की िक्रस्टर को भी धन्यवाद दिया।
तस्मानिया के पहले और ऑस्ट्रेिलया के तीसरे बुकर
सम्मान
2014 मैन बुक प्राइज, िब्रटेन
2011 तस्मािनया बुक प्राइज, वॉनि्टंग
2009 क्वीनसलैंड प्रीमियर लिटररी अवार्ड एंड फिक्शन वॉनि्टंग
2009 मिल्स फ्रेंकलिन अवॉर्ड, ऑस्ट्रेिलया वॉनि्टंग शॉर्टलिस्ट
2008 वेस्टर्न ऑस्ट्रेिलयन प्रीमियर लिटररी अवॉर्ड फॉर फिक्शन वॉनि्टंग
2002 कॉमनवेल्थ राइटर्स प्राइज - गुल्ड बुक ऑफ फिश- अ नॉवेल इन ट्वेलव फिश
कृितयां
2013 द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ
2009 वॉनि्टंग
2007 अननोन टेरेिरस्ट
2002 गुल्ड बुक ऑफ ए फिश-अ नॉवेल इन ट्वेलव फिश
1998 द साउंड ऑफ वन हेंड क्लेपिंग
1997 डेथ अॉफ अ रिवर गाइड
Wednesday, 1 October 2014
Monday, 25 August 2014
Wednesday, 6 August 2014
Subscribe to:
Posts (Atom)





















